Saturday, April 16, 2016

जीवन में एक बार पलायन कर लो। तो फिर हर बार पलायन करना आसान होता जाता है।

यह पूरी बात निजी है। लेकिन सा्वजनिक इसलिए कर रहा हूं। मुझे लगता है। यह मानसिकत किसी एक की नहीं होती। हम सब की है। हम अपने भीतर जब आत्मविश्वास खोते है। मेहनत करने की क्षमता भूलते है। तब हमें हर आसान चीज भी कठिन लगने लगती है। और हम पलायन करने लगते है। लेकिन कितना पलायन इसकी कोई सीमा भी तो हो।हम जिंदगी हारते जाते है। और हमारे बहाने मजबूत होते जाते है। एक दिन वे झूठे बहाने भी हमें खुद को भी सही लगने लगते है।लेकिन इसक नुक्सान यह है कि हम जिंदगी हार जाते है। जो हमें अपमानित करते हैं। हमें उन पर गुस्सा नहीं आती। अपने पर दया आती है।
पोलीपल्ली राजेश्वर राव। पूरा नाम। हम लोग प्यार से उन्हें कभी राजेश तो कभी पी राजेश तो कभी कभार सिर्फ पी से भी काम चलाते है पी राजेश कभी भी कुछ अच्छा पड़ते हैं। कुछ अच्छा सुनते हैं। तो वे हमें जरूर भेजते हैं। हमारे बीच एक अलिखित समझौता है। जो सालों से चल रहा है। खासकर जो बात मेरे चरित्र से मिलती जुलती है। तो वे दुखी होकर। कुछ हंसकर मुझे जरूर सुनाते हैें। कल आधी रात उनका फोन आया। बिना किसी भूमिका के ही कहा। एक बात पढी है। ध्यान से सुनो। एक बार तुम पलायन करते हो तो उसके बाद पलायन करना हर बार आासान होता जाता है। इतना कहकर वे शांत हो गए। अपनी आदत के चलते वे चुप हो गए। शायद चाहते थे मैं अपनी जिंदगी के तमाम पलायन सोचूं। शायद वे हमें वक्त दे रहे थे। और फिर मैं रात की उम्र तो बता नहीं सकता। लेकिन बहुत देर तक सोचता रहा।
मेरी दादी पत्रकारिता को क्या समझती है पता नहीं। लेकिन आर्थिक तंगी को देखकर अक्सर कहती रहती है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि तुम जिंदगी में इतने ही बड़ पाओगे। इसी तरह पी राजेश को भी लगता है। मेरे अंदर की आग जल्दी ही बुझ गई। लेकिन सामान कुछ बाकी है। इसे जब भी चिंगारी मिलेगी। एक बार धधकेगी। शायद यही वजह है कि वे बार बार फूंकते रहते है। लेकिन अपनी बेशर्मी है कि अपने अंदर से एक चिंगारी भी नहीं उठती है।
लगा कि पी राजेश से कह दू।अबकी बार भागूंगा नहीं। पलायन नहीं करूगा। चाहे मर जांऊ। लेकिन हिम्मत नहीं हुई। कायरों की तरह लिख रहा हू।ये हिम्मत कहां से और कैसे मिलेगी। लड़ने की मरने की डटने की। पी राजेश को फोन करने की। कोई तो बताओ।

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