Friday, May 7, 2010

पिता गाड़ी का एवरैज चैक कराते रहे मैकेनिक से और मैं पेट्रौल फूंकता रहा।

मुझे पहली बार लगा था कि उड़न खटोला में इसी तरह का मजा आता होगा। जब पिता ने पहली बार दो पहिया वाहन लिया। कितना अजीब अनुभव था कि तुम जितना चाहो उतना तेज चला लो। सांस भी न फूले। और मजा भी इतना .....कि बस बयां ही न हो पाए। बात उन दिनों की है जब हम स्कूल में दुनिया दारी समझने लगे थे। और उस समय मुझे वाहन मिला। उपलब्धि था। ठीक उन्हीं दिनों मुझे अपनी एक क्लास की लड़की से प्रेम हो गया था। उसके पिता फौज में थे। और वह कैंट में रहती थी। और हम एक दम बाजार में। यानी कई किलोमीटर का फासला। जो कभी पट न पाया। खैर।
पिता ने जब वाहन खरीदा तो शायद उन्हें लगा होगा कि इसका एवरैज दूसरे वाहनों से अच्छा है। पेट्रोल कम खाएगी। और चलेगी ज्यादा। लेकिन उन्हें जल्दी ही निराशा हाथ लगी। वे पेट्रौल भराकर आते। और कुछ ही समय में गाड़ी में रिजर्व लग जाता। वे कुछ सोचते और फिर अपनी गाड़ी को मैकेनिक के पास ले जाते। वो कुछ ठीक करता। लेकिन दो पहिया वाहन कार की तरह एवरैज दे रहा था। ये बात गाड़ी मैकेनिक को भी समझ न आए। दो पहिया वाहन 14 से 15 किलोमीटर एक लीटर में चलता है। वह अपने बाल खुजाए। लेकिन हर बार कुछ ठीक कर दे। और पिता को भरोसा हो जाए। कि अब गाड़ी ठीक हो गई है। वे पूरे यकीन के साथ पेट्रोल का एवरैज नापते और उनका ये भरोसा जल्दी ही टूट जाता।
प्रेम में भी कितनी परेशानी होती है। हालांकि मोबाइल ने कई परेशानियां दूर की है। हमारे समय में पता ही नहीं चलता कि वह कहां है। बस इतना समन्वय था कि उसे हर शाम वॉक करना है। और एक वाक में आप कितने चक्कर लगा सकते है। एक या दो। लेकिन बाकी चक्कर वॉक शुरू करने वाले के पहले लगाने पढ़ते थे। लेकिन वो शाम। उसकी कोई कीमत नहीं। शाम चार बजने के बाद छह बजे तक का हर मिनिट याद होता था। और फिर किस तेजी से वाहन लेकर भागते थे। और वाक करती हुई वो दूर दिखती। हमारी तपस्या पूरी होती। और शिव वरदान के लिए खड़ा हो जैसे। फिर जब और समझदार हुए तो कई बार तो उसकी कार को घर से लेने और छोड़ने भी जाते थे। उस गाड़ी पर कितनी उपलब्धियां रही। पहली बार जब वह गाड़ी पर बैठी। पहली बार जब वह हमारे साथ बहुत दूर तक घूमने गई। और हां पहली बार जब उसने हमारी गाड़ी को चलाया। हां एक बात और थी। हमारी गाड़ी का एवरैज खराब करने में। उन दिनों हमारे मित्र विवेक पांडे भी प्रेम में थे। सो हमसे जब भी फुर्सत हो तो वह उनके काम भी आती थी।
आज मैं कारों में घूमता हूं। अब गाड़ी में पेट्रौल भराना तनाव की बात भी नहीं होती। आप कह सकते है कि दो पहिया वाहन से कार ज्याद सुविधाजनक है। स्टेटस सिंबल है। लेकिन फिर वह मजा क्यों नहीं आता। क्या करूं फिर से किसी से प्रेम कर लूं। जो वाक पर निकलती हो। और उसे देखने फिर से चक्कर लगाना शुरू करू। लेकिन ये खबरों की डेडलाईन भी तो है। इसका क्या करूं। कुछ सुझाइए। कुछ बताईए। अपने अनुभव भी हमें बताए क्या परेशानी रही आपको अपनी प्रेमिका से मिलने में। आज शायद मेरे पिता को पता चल ही जाएगा। कि गाड़ी का एवरेज खराब नहीं था। बेटा ही कुछ खराब हुआ जा रहा था।

4 comments:

  1. when did you graduate to 4 wheels?

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  2. My Dear Alok,

    Badti umar ke saath -saath aadmi...Business oriented (calculative)(Naap-Taul OR Baniya ) hone lagta hai...

    Aur PREM ki pahli sidi hai NISWARTH SAMARPAN BINA KISI SHART AUR SHARTH KE...

    Zindgi ka wo pehla Ehsas aadmi kabhi nahi bhul pata ...Baad me hum habitual se ho jate hain... Aur essason ka koi meaning nahi rah jata...

    Hame me bhi gaon me shaam ko 4:10 par hi pressure banta tha aur nadiya kinare jane ki ichchha hoti thi ... Kyoki issi time wo bhi nadiya kinare se guzarti thi......

    Ye anmol pal koi vapas nahi la sakta my dear...

    Ab to hum sab BANIYE ho gaye hain..

    Purani yaadon ko revise karne ka dhanyabad...

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