Sunday, May 29, 2016

मछलियां सीख जाती है। हम इंसान नहीं सीख पाते। ऐसा क्यों ।

पिछले दिनों एक वीडियो देख रहा था। aquarium  का। अपन  आज तक किसी ऐसे शहर मे गए नहीं। जहां पर इस तरह के  aquarium होते हैं। सुना है पचासों फुट लंबी कांच की टंकियां। उनमें घूमती बड़ी मछलियां। शार्क भी। जहरीले मैंढक। कच्छुए। और न जाने कौन कौन से पानी के जानवर। देखकर विचित्र लगा। लेकिन ये अपनी व्यक्तिगत परेशानी है।aquarium में  मछली देखें। पिंजड़े में पक्षी। या फिर किसी चिड़िया घर में बंदर या शेर। मन उदास हो जाता है। अपन इनका मजा नहीं ले पाते। उनकी कैद उदास करती है। लेकिन इस विशालकाय aquarium को  देखकर मन ये सोचने लगा कि ये बड़ी मछलियां जब सागर में होती है। तब छोटी मछलियों को खाकर या फिर जीव जंतुओं को  खाकर जीवित रहती है। फिर aquarium में ये बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को क्यों  नहीं खाती। कई लोगों से बात की। इंटरनेट खंगाला। कुछ जानकारों  से चर्चा की। फिर दुनिया भर में घूमते फिरते शिव भैया से पूछा। उन्होंने मजेदार बात बताई। बोले इन विशालकाय मछलियों की छोटे से ही कंडीशनिंग होती है। उन्हें इस तरह पाला जाता है। जब वे छोटी होती है। उन्हें तभी एक तय समय में मीट के टुकड़े डाले जाते हैं। और उन्हें उस समय उस तरह के भोजन की आदत हो जाती है। कई जगहो पर तो एक विशेष प्रकार का संगीत भी उस सयम बजाया जाता है। यानि संगीत के बजते ही उन्हें लगता है भोजन का समय हो गया। और फिर वह टुकड़ा जो उन्हें  हर दिन दिया जाता है। वही उन्हें भोजन लगता है। लेकिन आदत तो देखिए सागर में जो चीज उन्हें भोजन लगती है।इस तरह के aquariumमें वह उनके साथ रहते  है।
बात एक aquariumकी नहीं है। बात हमारी सोच की है। क्या समाज की इस हालत के लिए हमारे परिवार दोषी है। या हमारा समाज दोषी है। लोगों को अपराधी बनाने के लिए। क्या हमने उनकी कंडीशनिंग ऐसी कर दी  है। कि वे इस तरह दरिंदे बन  गए है। क्या हमारे  मां-बाप। या हमारे स्कूल। या फिर समाज। सरकारें। समाज की हिंसक सोच की कौन जिम्मेदारी लेगा। हम मछलियों की मानसिकता बदल सकते हैं। लेकिन इंसानों की नहीं. फिर वही  दिल्ली । फिर वही हालात। फिर एक लडकी का अपहरण। हमने इतने सालों में क्या बदला। किसने कोशिश की है।
मुझे लगता है। हमारे  मां-बाप। हमारे परिवारों को अपने बच्चों  को  संस्कारित करने के लिए एक बार फिर से सोचना पड़ेगा। अपने बच्चों  की परवरिश में कहीं हम गलती तो नहीं  कर रहे है। मैं अक्सर सुनाता हूं। बच्चों  को किताबों या बातों से संस्कारित नहीं किया जाता ।उन्हें महसूस कराया जाता है। मुझे पिता बने हुए सालों हो गए। लेकिन सागर जाता हूं। तो स्टेशन पर अब भी कई बार पिता चले आते हैं। एक बार तेज बारिश हो  रही थी। स्टेशन से बाहर निकला तो  आटो किया। और घर जा रहा था। तभी अचानक बारिश में भीगते पिता पर नजर पड़ी। आटो रोका। कुछ समझ में नहीं आया। पूरी तरह झल्ला गया। मैंने कहा। इतनी बारिश मे ंतुम भीगकर आए हो। मैं साथ चलूगां। मैं भी भीग जाउंगा। सामान भी भीग जाएगा। तुम्हारी गाड़ी कहीं रपट जाए वो अलग। मैं आटों से इत्मीनान से आ जाता। न तुम भीगते न हम। न हमारा सामान। लेकिन मुझे लगा वह एक संस्कार था जो उस रात में मुझ तक पहुंचा। अब शायद जीवन में हम उनसे कभी नहीं कह सकते कि दिल्ली में टैक्सी करके घर आजाना।या टैक्सी कर दी है। स्टेशन चले जाना। हमें शायद अपने बच्चों को फिर से प्रेम से करूणा से संस्कारित करना पड़ेगा। जब मछलियां सीख सकती है।  तो हम क्यों नहीं।

Saturday, May 28, 2016

किसी का मकान खाली होता है। मुझे बुरा लगता है। मैं मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार हूं क्या

आप मझे बीमार कह सकते है। मनोवैज्ञानिक रूप से। या फिऱ पागल। सनकी। या अपनी सुविधा से कुछ और। लेकिन मैं झूंठ क्यों बोलूं। जब भी कभी मुझे घर के नीचे सामान से भरा जा रहा ट्रक खड़ा दिखता है। मुझे बुरा लगता है। किसी का मकान खाली होता। मुझे अच्छा नहीं लगता। यह बात किसी से कहूंगा तो मुझे मूरख कहेगा। (यह शब्द शिव भैया मेरे लिए अक्सर इस्तेमाल करते हैं। ) लेकिन आप को बता सकता हूं। दफ्तर से लौटा तो घर के नीचे एक ट्रक खडा था। सामान भरा जा रहा था। किस का सामान था पता नही। किस का मकान खाली हो रहा था पता नही। बस कोई जो अब तक हमारे साथ रहता था। अब जा रहा हैं। मन यही सोचकर उदास हो गया। उपर आया तो पत्नी ने पूछा मूड क्यों खराब है। फिर किसी से झगड़ा करके आए हो क्या। मैंने सिऱ पर हाथ फेरा वो समझ गई। बोली हां पता है तुम्हारे ऊपर सिंग नहीं लगे है। लेकिन तूम सिंग वालों से टकराते घूमते हो। मैने मुस्करा कर बात खत्म कर दी।
ऐसा क्यों होता है। किसी का घर खाली हो तो मुझे बुरा लगता है। किसी का घर टूटे तो अपनों की याद आती है। कल रात घर के नीचे एक दादी गर्मी में बैठी थी। मैंन पूछा तो बताया बहू बाजार गई है। दरवाजा बंद करके। सो यही बैठी हूं। बेटा पानी पिला दे। मैं कान्हा को गोद में लेकर आ रहा था। पसीना पसीना। कुछ देर को डर गया लगा क्या कल को कोई ऐसा मेरे साथ भी करेगा। पता नहीं। लेकिन शायद हर दूसरे की परेशानी या हर दूसरे का दुख अपना मान लेता हूं। शायद इसीलिए हर खाली होते घर के सामान के साथ मेरा कुछ हिस्सा भी उसके साथ चला जाता है।

Thursday, May 26, 2016

मोहब्बत की दुनिया में। ये कौन नफरत घोलता है। कल लव मैरिज की थी।और आज ?

गांव  की चौपाल में बैठी महिलाएं उनसे नफरत करती थी। धीमी आवाज में उन्हें हमेशा भला-बुरा कहती हैं। उन्हें बदतमीज और बेशर्म भी अक्सर कहा जाता रहा है। लेकिन मुझे वे दोनों बहुत अच्छे लगते हैं। एक दम ठेठ प्रेमी। जो अभी कुछ महीनों पहले शादी करके आए है। जिनके उपर जेठ दोपहरी में भी सावन बरसता है। वे जहां से भी गुजरते हैं मोहब्बत की आबोहवा अपने साथ बहाकर ले जाते हैं। प्रीत की खुशबू से उनके होने का अहसास होता है। बस वे परवाह नहीं करते दकियानुसी रिवाजों की। झूठी बासी औपचारिकताओं को नहीं निभाते। सम्मान देते है। बस क्लास टीचर की तरह तुम्हारी मौजूदगी उन्हें परेशान नहीं करती। सिर्फ यही उनका गुनाह है। जो कुंठित समाज को अखरता है। वे शाम को सज संवर कर घूमने निकलते हैं। पहली बारिश में भीगते हैं। हां खाली सड़क पर हाथ पकड़कर चलते है। आइसक्रीम एक ही लेते है। साथ साथ खाते हैं। दूसरी फिर लेकर वहीं खाने लगते है। बच्चों की तरह। उनकी ये मासूमियत मुझे कान्हा जैसी लगती है। शायद इसीलिए भी वे दोनों मुझे अच्छे लगते है।
मुझे उसकी नौकरी का पता नहीं। लेकिन वो आधी-रात को कहीं से लौटती है। और उसका पति प्रेमियों की तरह घर के नीचे  हीइंतजार करता रहता है। गर्मी में कई बार ठंडे पानी की बोटल भी साथ लिए रहता है। कई बार वे लोग नीचे से आईसक्रमी खाने चले जाते है। पूरे अल्हड़पन और मासूमियत के साथ बतियाते हंसते घूमते रहते है। मुझे उनको देखकर ताजगी का अहसास होता है। चलो इस दुनिया में  कोई तो खुश है इतना कि जो बाहर भी मजा बांट सकता है। वर्ना लोग तो सिर्फ दुख ही दुख बांट  रहे है। रात को अक्सर बालकनी में उसी समय कभी चाय पीता रहता था। कभी कुछ पढ़कर घूमता रहता हूं। तो कभी किसी अाहट पर यू हीं बाहर हवा खोरी करने लगता हूं। और उसी बीच उन्हें मेें देख लेता था।
कल करीब एक बजे रात एक किताब पढ़ रहा था। कुछ आंधी सी थी। कुछ तेज हवा। मौसम मजेदार सो अपन बाहर बालकनी पर टहल रहे थे। एक कार आकर रुकी। वह लड़की भी उत्तरी। बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने अपना बैग उतारा। ड्राइवर पूरी बेशर्मी के साथ देखता रहा। उसने मदद की कोई पेशकस तक नहीं की। मुझे लगा इस बैग को लेकर वह पांच मंजिल कैसे चढ़ाएगी। सो मैं ही उतर  गया। वह न करना चाहती थी। लेकिन काम असंभव सा था। सो कुछ संकोच के साथ हां कर दिया। मैंने सीधा पूछ ही लिया। वो कहां है। वो चुप रही। मैंने सोचा शायद गलत सवाल था। मैंने चुपचाप बैग उसके घर पर रखा। और नीचे उतर आया। इसके पहले  सिर्फ इतना ही संबंध था कि कान्हा उसे बुआ बुलाता था। उसके पति को उसी ने सिखा दिया था। फूफा। सो वह उसे फूफा कहता है।
फिर अचानक दो तीन दिन बाद मकान खाली हो रहा था। मैंने फिर पूछा क्या हुआ। वह चुप रही। फिर न जाने क्यों वो मेरे पास आकर बैठ गयी। उसने कहना शुरू किया भैया हम दोनों मद्रास में  एक साथ काम करते थे। प्यार हो गया। हम लोग अलग अलग जाती के थे। सो घर वाले माने नहीं। रोज रोज की धमकियों से तंग आकर हम लोग दिल्ली  आ गए। हम मजे में थे। सिर्फ इसका नशा हमें परेशान करता था। हम मना करते रहे। ये झूठ बोलता रहा। बात सीमा से उपर हो गई। हम अलग अलग हो गए। वो मुम्बइ चला गया। मेरी नौकरी कोलकाता में लग गई ैहै। में जा रही हूं। कान्हा को बहुत सारी चॉकलेट वो देकर जाने लगी। मैंने कहा तुम्हारे पास एक मिठास है। बहुत अंदर। कुए की तरह जो सबको मीठा पानी देते है।अपनी मिठास खोना नहीं। उसे बनाए रखना। और अपना अंहकार त्यागकर कुछ दिनों बाद फिर सोचना। शायद कोई रास्ता दिखे।
रात के एक बजे हैं। वो आइसक्रीम वाला शायद अपनी दुकान उनके इंतजार में खोले होगा। मुझे बालकनी पर टहलते हुए लगा कि जाकर उससे कह दूं। वे लोग घर छोड़कर चले गए है। अब तुम्हारे पास इतनी रात गए कोई इठलाता हुआ नहीं आएगा। न जोन कौन है जो प्रेम की इस दुनिया में नफरत घोलता है। 

Sunday, May 22, 2016

अभी तक तो हम खुद गोद में हैं। कान्हा को कैसे उतार दे।

कान्हा मंडे और संडे के बीच का अंतर सीख गए हैं। वे मंडे को ही सुबह सुबह आ जाते हैं। रिहर्सल करने के लिए। पापा आज मंडे है। फिर पूरा हफ्ता गिनते है। सेटरडे कहते कहते पूरी आंख चमक जाती है। और आखरी में कूंदकर कहते हैं। फिर आएगा संडे। और लंबी लिस्ट सुनाते हैं। पहले रेबिट को कैरिट खिलाएगें। डियर को ब्रैड। पीकॉक को दानेें। डक को आटे की गोलियां। फिर चलेगें। शनि मंदिर। रास्ते में जगन्नाथ मंदिर भी मिलेगा। और आखरी में खाएगें आइस्क्रीम। मॉल में। उनके इस कार्यक्रम में कोई फेरबदल करना पाप लगता है। लिहाजा वो जो कहते है। सो अपन करते चलते है। आज उन्हें गोद में लेकर घूम रहे थे। डियर पार्क में। एक दोस्त मिल गए। कहने लगे बेटे को तुमने सिर पर बैठा रखा है। मैंने कहा सही कहा तुमने। कहने लगे इसे कम से कम गोद से तो उतार दो। मैंने कहा मैं खुद ही अपने मां-बाप। दादी। बुआ। सबकी गोद में  बैठा हूं। इसे कैसे उतार दूं।

उनके जाने के बाद मुझे लगा कि अपनी परवरिश का असर अापके बच्चों  पर पड़ता है। जिस तरह से आपको पाला गया है। उसी तरह अाप अपने बच्चों  को पालते हैं। जैसे बचपन में  मुझे चाट बहुत पसंद दी। चाट खाकर बीमार होना भी स्वाभाविक सी बात थी। लेकिन मेरे पिता ने मुझे कभी भी चाट के लिए ललकने नहीं दिया। न अपन ने कभी चटे की तरह चाट के ठेला को देखा। न किसी को चाट खाते देखकर मन ललचाया। खूब चाट खाई छक के। और आज ये हालत है कि सालों से मैंने गोल गप्पे नहीं खाए। कल ही केबिनेट मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने बुलाया था।  पार्टी में। लेकिन मैंने वहां भी गोल-गप्पे या आलू टिक्की नहीं खाई। सो उसी तरह से जाने अनजाने में कान्हा के साथ भी मैं वहीं व्यवहार करता हूं। उसे आइस्क्रीम बहुत पसंद है। और आइसक्रीम खाने के  बाद खांसी आना तय है। लेकिन आइसक्रीम देखकर उसकी आंखें चमकती है। और फिर वह कमजोर कड़ी पर चोट करता है। मेरी  तरफ देखता है। मैं हर बार उसकी मदद करता हूं। फिर वह खांसता है। तो चुपचाप मेरे हाथ से दवाई भी पी लेता है।

आज के आधुनिक  तौर तरीके मेरे मां-बाप शायद सागर में नहीं जानते थे। लेकिन जो भी कुछ थोड़ा बहुत जानते थे। उन्होंने मुझ पर नहीं थोपा। सो अपना विकास प्राकृतिक हुआ। अगर जीवन में बहुत कुछ नहीं कर पाए। या सफलता के झंडे नहीं गाड़ पाए। इसके लिए अपनी परवरिश नहीं शायद कुंडली दोषी है। इसी तरह मुझे  लगता है कि मेरा बेटा भी जैसा भी हो प्राकृतिक हो। उसे किसी प्रकार की कोई कुंठा न हो। मुझे सिर्फ इतना ही करना है। ताकि में कह सकूं। जैसे मेंरे परिवार ने मुझे पाला था। वैसा मैंने कान्हा को पाल दिया। हां दादी चिंता बहुत करती थी। सो् अपन  कान्हा की चिंता करते हैं.। वह अभी से  हंसता है। कहता है पापा आप डरते बहुत हो। मैं भी कभी दादी से .यही कहता था  कि आप डरती बहुत हो।  क्यों कि उन्होंने कभी अपन को देर रात फिल्म देखने नहीं जाने दिया। न कभी ऐसी जगह पिकनिक जाने  दिया जहां  नदी या गहरा पानी हो। देर होेने पर दरवाजे पर खड़ी रहती थी। पिता ने कहा था कि कोई भी नशा करो पहली बार मेरे साथ करना। सो अपन कभी हिम्मत ही नही  कर पाए। पिता ने अपन से दोस्ती की सो अपन कान्हा के  दोस्त  हो गए। और हां अभी भी दादी फोन करके कहती रहती है। कि गर्मी है। बाहर निकलो तो खूब सारा पानी पी लेना। कुछ दिन पहले  तक ठंड को लेकिर चिंतित रहती थी। वह मुझे अभी तक गोद में बैठाए हैं। मैं कान्हाको अपनी गोद से कैसे उतार दूं। 

कृष्ण की तरह हैं। कौशल। सिर्फ मुुसीबत में आते हैं।

बोलो क्या काम हैं ? फोन की घंटी खत्म होते ही दूसरी तरफ से आवाज आती है। बस यू हीं याद आई तो फोन कर लिया। वह फिर बोला। काम है तो जल्दी बताओ। कहा नहीं। बस हालचाल पूछने को फोन किया था। हमें औपचारिकता में फोन मत किया करो। हमारे पास और भी काम है। रखूं फोन। मैंने कहा अरे सनो तो। वह फिर कुछ खिसयाकर बोला। अरे यार तुम्हें गप मारनी है। तो तुम्हारे पास बहुत लोग है। मुझे क्यों फोन कर रहे हो। फोन पर झल्लाहट सीधी कान तक सुनाई दे रही थी। रखता हूं। कुछ काम हो तो बताना। इस बेहद बदतमीज दोस्त का नाम कौशल कांत मिश्रा है। कौशल इस समय दिल्ली के नामचीन हड्डी के डाक्टर है। वे पहले एम्स में थे। आजकल दिल्ली के एक महंगी और अत्याधुनिक अस्पताल में अपना परचम लहरा रहे है। 
कौशल जैसे दोस्त भगवान का आशीर्वाद है। जो वो खुश होकर किसी किसी को दे देता है। इस बद-दिमाग आदमी से दोस्ती करीब एक दशक पहले हुई थी। उन दिनों अपन हैल्थ बीट के रिपोर्टर थे। और कौशल डाक्टरों के नेता। एंटी रिजर्वेशन की कमान संभाले घूमते थे। अपन को काम का जुनून था। और कौशल को अपने मिशन का। दोस्ती हो गई। वक्त के साथ संबंध गहराते गए। जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की बाइट के लिए अपन जा रहे थे। और एक्सीडेंट हुआ। चार हड्डी टूट गई। दर्द से रोते हुए फोन किया। उधर से कौशल की आवाज आई। हिम्मत रखो। मैं दस मिनिट में पहुंचता हूं। कौशल छह मिनिट में ही आ गया। फिर इलाज हुआ। आजकल अपन कान्हा के साथ फुटबाल भी खेल लेते हैं। 
कान्हा जब 50 दिन के थे। तब वे बीमार हो गए। एम्स दिखाने गए थे। बात फौरन भर्ती की हुई। फुग्गे में से हवा निकलते सुना था। देखा था। अपने शरीर से वैसे ही हवा निकल गई। कौशल पूरी रात अपने साथ थे। हिम्मत दी। वो अलग। जब कान्हा पैदा हुआ। उस रात कौशल दरी पर उसी एम्स के गलियारे में सोए थे। जहां उनकी तूती बोलती थी। आज भी कोई काम आ जाए। तो उनकी याद आती है। कौशल कृष्ण है। सिर्फ मुसीबत के समय आते है। औपचारिकता में फोन करो तो झल्लाते हैं। मेरे पास ऐसे कई जानने वाले है। जो परेशानी में छोड़कर चले गए। कौशल इकलौते है। जो परेशानी में आते है।

Wednesday, May 18, 2016

कछुआ से अच्छा गुरू कौन हो सकता है।

कान्हा पेंटिग सीखने जाते है। पहले दिन में भी उनके साथ गया। सिखाने वाले टीचर ने पूछा कौन सा जानवर पैंट करना है। कान्हा ने कछुआ चुना। शायद वह बड़े आकार का था। या ज्यादा रंगीन था। खाने ज्यादा थे। रंग भरने के लिए। वजह तो कान्हा ही जानता होगा। लेकिन मैंने सोचा कि जिंदगी हो या पेंटिंग कछुआ से अच्छा गुरू कौन हो सकता है। बचपन की कहानियों में हमने सीखा है। अगर व्यक्ति लगातार चलता रहे। तो वह खरगोश यानि ज्याद क्षमताओं वाले व्यक्ति को भी हरा सकता है। हमने यह भी सीखा कि महत्वपूर्ण जीवन में क्षमताएं नहीं है। न भगवान की दी हुई शक्तियां है बल्कि आप की उद्देश्य के प्रति निष्ठा और उस पर लगातार काम करना ही सफल जीवन का निचोड़ है। कछुआ लंबी उम्र जीता है। उसकी एक और विशेषता है। वह अपना विकास लगातार करता रहता है। हमें उससे यह भी सीखना होगा।

Sunday, May 15, 2016

तुम्हारे नाम पर किताब इश्यू थी। सो वापस नहीं की।

तुम तो इमानदारी का ढोल पीटते रहते हो। हर वक्त। फिर लाइब्रेरी की यह पुस्तक वापस क्यों नहीं की। और इसे सूटकेस में क्यों रखे हो। अलमारी में क्यों नहीं। इसे कभी पढ़ते तो हो नहीं। सिर्फ जिल्द बदलते रहते हो। इसे कपड़े में लपेट कर गीता की तरह क्यों रखे हो। पत्नी के एक सवाल में। हजार बातें छुपी थी। इमानदारी पर तंज था। तो कोई पुरानी चोरी पकड़ने का आत्मविश्वास। नई बात जानने की हुमक। और न जाने क्या क्या। मैंने कहा कि यह किताब किसी अपने के खाते से इश्यू थी। सो वापस नहीं की। खंडर महलों में भी कुछ पत्थर। कुछ टूटी दीवालों के हिस्से बचे रहते हैं। जिनसे खत्म हुई चीजें भी अपनी पहचान बताती रहती है। मरी हुए रिश्तें भी जिंदा बने रहते है।
जिंदगी में अपन ने दो ही काम समय से किए। कालेज टाइम से पहले जाना और रोज लाइब्रेरी जाना। हालांकि लाइब्रेरी के अंदर नहीं जाता था। अपनी कोर्स की किताब लाइब्रेरी के बाहर ही मिल जाती थी। उसी की आंखों में ढाई आखर पढ़ लिया करते थे। और पंडित हो गए। बीए में दो और एम ए में चार किताबें एक छात्र को मिलती थी। लेकिन अपने कार्ड पर हमेशा ही दोस्तों का कब्जा रहा। या फिर साहित्य की किताबें उन पर निकलती और जमा होती रही। अंग्रजी से एम ए कर रहा था।लेकिन हिंदी साहित्य की अच्छी किताबें हमेशा रजिस्टर में अपने नाम पर ही लिखी रहीं। और जब जरूरत पड़ी तो न कार्ड था और न समय। फिर किसी ने किताब खोजी और अपने कार्ड पर इश्यू कराकर दे दी। लेकिन वह किताब आज तक पढ़ी नहीं। सिर्फ उसकी पूजा करता रहता हूं। और जिल्द बदल देता हूं। कोई राजदार मिल गया तो कह दूगा कि इसे मेरे साथ जाना है। आखरी वक्त याद रखना.।