Thursday, September 29, 2011

दादी का फोन आया। मूंगफली आ गई। तुम कब आओगे।

पिछले कई महीनों से मैं बहाना बना रहा था। जब देशी मूंगफली मिलने लगेगी। तब आउंगा। पिताजी इस फसल की पहली मूंगफली लाए थे। घऱ के लोग बताते हैं।दादी ने मूंगफली खाई बाद में। पहले फोन किया। में चिंदबरम और प्रणव मुखर्जी के मेल मिलाप पर नजर रखे था। तभी नार्थ ब्लाक में फोन बजा। और दादी की आवाज आई। सागर में देशी मूंगफली मिलने लगी है। घर भी आ गई है। तुम छुट्टी की बात कर लो। और आजाओ। और हां। इस बार ज्यादा दिन की छुट्टी लेकर आना। तुम्हारा आना पता ही नहीं चलता है.....इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया। वे पिछले कुछ सालों में खबर की urgency भले न समझी हों। लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया की व्यस्तता समझ गई है।
कुछ लोग कहते हैं। बंगाली रसगुल्ला खाना है तो कोलकत्ता चलो। बड़ा पाव के लिए मुम्बई चलो। मथुरा में चाट का मजा है। तो आगरा में पेठा। और पत्नी कहती है कि इलाहाबाद में अमरूद अच्छे मिलते हैं। लेकिन जो मजा अपन को सागर में मूंगफली खाने में आया। वो और कहीं नहीं मिला। बात स्वाद की नहीं। मजे की है। सागर की मूगंफली। मूंगफला कहलाती है। उनमें एक अलग तरह की नमी रहती है। जो स्वाद को और ज्यादा बढ़ाती है। पूरे साल में यह देशी मूंगफली सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही मिलती है। मूंगफली तो पूरे शहर में एक जैसी ही मिलती हैं। लेकिन जो दुकानदार अच्छी चटनी बनाता है। दुकान उसी की चलती है। मूंगफली का महत्व मैंने जनसत्ता में समझा। मैं उन दिनों सुधीर चाचा से पत्रकारिता की एबीसीडी सीख रहा था। सागर जाते समय में मैंने पूछा । आपको कुछ लाना है क्या। वे बोले मूंगफलां। और मैं उन्हें ले आया। उन्होंने छुट्टी लेकर उन्हें भूंजा। और खाया।
मूंगफलां खाने का मजा। सागर में ही है। अपन ने दिल्ली लाकर और भूंज कर देख लिया। बात बनी नहीं। फिर मुझे लगा जैसे चाय स्वाद की बात नहीं होती। आप जिसके साथ बैठकर पीते है। मजा उसका साथ देता है। यही बात सागर की है। दोस्तों के साथ कितने बार हमने घंटों मूंगफलां खाया। उन्हीं ठेलों पर कबीर से लेकर शेक्शपीयर और पिकासो से लेकर खलील जिब्रान तक पर गप्पे ठोकी। अल्ला रख्खा का तबला और रविशंकर जी की सितार इन्हीं ठेलों पर चर्चा में घुली और और हम मूंगफलां के साथ खा गए।
दिल्ली जैसे महानगर में जहां हर मिनिट की कीमत होती है। वहां पर कोई ठेले पर घंटों खडे़ होकर मूंगफलां खाने की सोच भी नहीं सकता। लेकिन सागर में यह आम बात है। एक बार में सिर्फ कुछ लोगों को ही मिल पाती। फिर करीब आधा घंटा इंतजार करना पडता है। अपनी बारी का। इस तरह से कई बार घंटों मूंगफलां खाई। इस बार देखो क्या होता है। पिछले कई सालों से सागर सही वक्त पर नहीं पहुंच पाया। और इन्हें खा नहीं पाया। अगर सागर इस बार गए और मूंगफलां आते रहे। तो खाकर आंएगे। अगर आपको फुर्सत हो तो हमारे साथ चलिएगा। macdonalds और domminos से ज्यादा मजा आएगा। हमारे शहर में मूंगफलां के ठेलों पर। साथ में हरी चटनी। और ढेरों गप्पे।

Wednesday, September 28, 2011

सागर में धूम। दिल्ली में सन्नाटा

सोचा था। सुबह जल्दी उठेगें। नहा कर। पूजा करेगें। मंदिर भी जाएँगे। नवरात्र जो आरंभ हो रहे हैं। लेकिन कल रात दिल्ली में एक हादसा हो गया। एक इमारत गिर गई। कई लोगों की जान गई। कई जख्मी हुए। अपनी ड्यूटी लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के बाहर थी। सो देर रात तक घायलों की स्थिति और मरने वालों की संख्या पर खबर भेजते रहे। देर रात घर लौटे। मन परेशान था। मौत जब भी करीब से देखों। दहला देती है। जिंदगी के तमाम मायने बेमानी लगने लगते है। सच को इस तरह करीब देखकर मन बैचेन होने लगता है। हमारी झूठी जिंदगी के महल ताश के पत्तें की तरह गिरने लगते है। तड़के तक सोचता रहा। सो नींद देर से लगी। उठा भी देर से। लिहाजा कुछ भी नहीं कर पाया। सिर्फ दादी को फोन किया। और जिस अंदाज में होटल से खाना मंगाते हैं। या पीज्जा का आर्डर देते है। कहा आशीर्वाद दे दो। दिन शुरू कर रहा हूं।
अपने सागर में नवरात्र की शुरूआत का मजा पहले से ही आने लगता था। काली जी बैंठेगी। पंडाल बनेगा। प्रतियोगिताएं होगी। हां और भाषण प्रतियोगिता जिसे में ही जीतता था। नौटंकी से लेकर रामलीला तक बस मजा ही मजा था। काली का तिगड्डे पर बैठना मानो किसी मेला जैसी रौनक का बिखरना हो। काली की मूर्ति का चुनाव करना। मूर्ति को कई तरीके से सजाना। अपने मोहल्ले की काली का पंडाल सबसे खूबसूरत हो इस पर दिमाग लगाना। नए नए प्रयोग करना। सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाना। कोशिश करना की एक दिन कवि सम्मेलन भी हो। ताकि मोहल्ले में अपनी धाक बरकरार रहे। और इस तरह पूरा महीना किस तरह निकल जाता था। पता ही नहीं चलता था।
हो सकता है आप लोगों ने शेर नाच न देखा हो। हमारे शहर में कुछ लोग मन्नत मांगते है। कुछ लोग शोकिया शेर बनते है। वे पूरी तरह शेर के रंग में डूब जाते है। उसी तरह अपने शरीर को पोतते हैं। और हर पंडाल पर जाकर शेर की तरह नाचते हैं। नांचने की यह विधा एक दम अलग तरह की है। और इसके अलावा फिर सप्तमी को रामदल निकलता है। इसमें अखाड़े निकलते हैं। अपने अपने उस्तादों के साथ। पूरी तरह सजे हुए लोग। अखाड़े के पूरे हथियारों के साथ। और फिर आता है दशहरा। जिस दिन काली निकलती है। हमारे यहां रावण दहन इतनी बड़ी घटना नहीं होती। हां काली का निकलना पूरी रात चलता है। उस रात शहर में घूमने में कई तरह का मजा आता है। एक तो आपको वे दोस्त भी मिल जाएँगे। जिन्हें आपने सालों से देखा ही न हों। उनके साथ गप्पे। चाय पर चाय और पान। दशहरा का मजा कई गुना करता है।
दिल्ली में पता ही नहीं चलता। न नवरात्र का । न काली के बैठने का मजा आता है। कुछ देर पहले घर लौटा हूं। दादी से बात हई। उन्होंने बताया आज तो पूरा दिन बाजों की आवाज सुनते ही निकला। और मौहल्ले की काली बैठ गई रौनक पहले जैसी नहीं हैं। लेकिन अच्छा लग रहा है। मोहल्ले में काली कमेटी का अध्यक्ष नामवर आदमी बनता था। बात साफ थी। जिसका चरित्र साफ सुथरा और इमानदारी वाला हो। मोहल्ले में जिसकी इज्जत हो। हां उसे आरती करने मिलती थी। और वह पूरे पंडाल का महाराजा होता था। मुझे बचपन में कई बार लगा। मैं बड़ा होकर। काली कमेटी का अध्यक्ष बनूंगा। और हर साल बनता ही रहूंगा। लेकिन वक्त ने मुझे अध्यक्ष भी नहीं बनने दिया। और मोहल्ला ही छुटवा दिया। अब दिल्ली में न काली कमेटी है। और न परकोटा मोहल्ला। मैं किसका अध्यक्ष बनूं।

Sunday, September 25, 2011

कब तक पंजों के बल पर खड़े रहेंगे हम।

आप चाहे तो आशीष देवलिया को गालियां दे सकते हैं। उनका नंबर है ....९८७१०१७३७० । अगर आपको मेरा ब्लाग बुरा लगता है तो। अगर अच्छा लगता है। तो उन्हें बधाई दीजिए। अपन कंप्यूटर की तकनीक को लेकर पूरी तरह से अपढ़ है। अपना कंप्यूटर खराब हो गया। उसमें वाइरस आ गया। और मेरा हिंदी फोंट खराब हो गया। उसे वापस लाने की कोशिश की। लेकिन हुआ नहीं। अपन समझ गए। अपने कूबत में नहीं है। फिर आशीष से कहा और उन्होंने कोशिश करके। इसे चालू किया। और फिर से हम अब ब्लाग लिखना शुरू कर रहे हैं।
जो समय निकल जाता है। उसे याद करना। उसे लिखना कुछ अजीब सा मन में खिचाव पैदा करता है। लगता है। कि हमने अपने समय का इस्तेमाल ठीक तरीके से नहीं किया। वह यू हीं जाया हो गया। आप लोगों से महीनों बाद बातचीत हो रही है। कभी मैं बीमार रहा। तो कभी कंप्यूटर। कभी फोन गुम गया। तो कभी फोंट ही गुम हो गए। हां इन दिनों कुछ नई किताबें जरूर पढ़ी।
एक विचारक की बात मुझे बहुत अच्छी लगी। कि तुम ज्यादा देर तक पंजे के बल नहीं खड़े रह सकते। मैं यह बात पढ़ कर घंटों सोचता रहा। हम तो अपनी जिंदगी में पंजों के बल ही खड़े रहने की कोशिश करते रहते हैं। पूरा समय इसी में निकलता है। कि जो हम नहीं है। उसे हम बार बार जताना चाहते हैं। अपनी ऊंचाई से ज्यादा दिखना चाहते है। हम किसे धोखा दे रहे हैं। अपनी झूठी उंचाई से । अपने आप को । या फिर दूसरों को । लेकिन धोखे की उम्र इतनी छोटी होती है। कि हमें सिर्फ दुख ही मिलता है उससे।
आज अपने एक बहुत पुराने दोस्त नोएडा से आए थे। नवरात्री में उनकी बहिन को लोग देखने आने वाले है। वे मेरी पत्नी के कुछ जेवर उधार चाहते थे। मना करते या उन्हें फलसफा सुनाते तो वे शायद बुरा मान जाते। लगा कह दूं। कि जिंदगी का इतना बड़ा रिश्ता तुम तय करने जा रहे हो। वो भी झूठ की बुनियाद पर। यह कैसे और कितने दिन चल पाएगा। लेकिन हिम्मत नहीं हुई कहने की। हम क्यों बार बार पंजों पर खड़े होना चाहते हैं। पता नहीं। लेकिन में तो शायद अभी भी पंजे पर ही खड़ा हूं। आशीर्वाद दीजिए। कि वापस अपने पैरों पर आ सकूं।। हो सकता है कुछ बोना हो जाउं।लेकिन सच्चाई तो वही है। क्या कहते है।

Friday, July 15, 2011

गुरूपूर्णिमा पर अवस्थी सर, सुधीर सर से लेकर रज्जाक चाचा तक सभी याद आते हैं।

अपन बुखार में हैं। लिखने की हिम्मत नहीं है। और कूबत भी नहीं। फिर भी जिद करके टेबिल पर बैठ ही गया। लगा गुरूपूर्णिमा है। कुछ तो लिखूं। हालांकि किसी गुरू को अच्छा लगता है। जब उसका शिष्य उचाइंयों पर पहुंचे। अपन किसी भी गुरू को गुरूदक्षणा नहीं दे पाए। गुरू की सबसे बड़ी दक्षणा होती है उसके शिष्य की कामयाबी। यह सुख तो किसी भी गुरू को अपन दे नहीं पाए। पछतावा भी है। और शर्म भी। फिर भी बेशर्मी से लिखने बैठ गया।
स्कूल। कालेज। पत्रकारिता। और फिर जिंदगी। ये अपने रूप बदलते गए। और हर मोड़ पर मुझे नए नए गुरू मिलते गए। जो वर्तमान जिंदगी की कठिनाइयां कम करते गए। व समझाते गए। और मैं आगे चलता गया। यह बात अलग है कि जो जिंदगी में कर्म करना चाहिए था। वो हमसे न हुआ। और हम जिंदगी के रास्तों पर पिछड़ते चले गए। अपने तमाम गुरू हमसे खुश है। लेकिन मेरी असफलता उन्हें दुखी करती होगी। वे शायद सोचते थे। मैं जिंदगी में ऐसा कुछ करू। जो उनकी शिक्षा को सार्थक करें। मैं कुछ दुनिया को ऐसा दे जाऊं। जो मेरी पढ़ाई लिखाई का अर्थ बने। लेकिन अपन ऐसा कुछ भी नया और रचनात्मक नहीं कर पाए। और जिंदगी को कलम घसीटकर काटने लगे।
अवस्थी सर ने मनोविज्ञान सिखाया। सुधीर सर ने पत्रकारिता। रज्जाक चाचा ने जिंदगी। रज्जाक चाचा का यह कहना कि जिंदगी में तीन चीजें साफ रखना। शरीर। लिबास। और नियत। सुनने में लगता है। आसान है। लेकिन सद नहीं पाता। बीच बीच में गिर ही जाता हूं। सुधीर चाचा का हाथ पकड़कर ही अपन जनसत्ता में घुसे। और आज भी पत्रकारिता में जो भी कर पाते हैं। उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने ही समझाया। लिखना और पढ़ना। और हां दादा की एक बात। जो अपने आप में गुरू है। जिंदगी में जो बो दोगे। वहीं काटोगे। संभल कर रहना। प्रकृति तुम्हारे सारे कर्म तुम्हें लौटाती है। बहुत सी बातें है। ब्लाग में नहीं लिखी जा सकती। इतनी जल्दी। फिर भी मुझे अपने तमाम गुरू याद है। आपको भी होगें। हे भगवान मेरे तमाम गुरूओं को अगले जन्म में सामार्थ्य शिष्य जरूर देना। जो उनका नाम रोशन कर सकें।

Thursday, July 14, 2011

धोखा हजार का नोट देता है। पचास पैसे का सिक्का नहीं।

शिव भैया अपने एक दोस्त को बाहर तक भेजने आए थे। वह अपने पन में हमसे मिला। हाथ मिलाया। मुस्कराया। हालचाल पूछे। और चला गया। मैं कैसे कह देता कि तुम्हें पहचाना नहीं। अपने पन का एक मान होता है। उसे रखना ही चाहिए। जब वह चला गया। तो मैंने भैया से पूछा। कि चेहरा पहचान लिया था। नाम याद नहीं आया। उन्होंने बताया। उसका नाम अभय कुमार है। वह इंडियन इस्टिट्यूट आफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में अस्सिटेंट प्रोफेसर है। लेकिन अभय इतने सरल। इतने सज्जन और इतने सीधे साधे हैं। कि उनके बारे में समझ पाना थोड़ा मुश्किल हुआ। लेकिन शिव भैया ने तपाक से कहा। और में पूरी बात समझ गया। वे बोले। आदमी धोखा हमेशा हजार के नोट से खाता है। पचास पैसे के सिक्के से नहीं। नोट वही नकली निकलता है। और कई बार तो उस समय जब उसकी जरूरत सबसे ज्यादा होती है। पचास पैसा का सिक्का ठोस होता है। और न कभी धोखा देता है। न नकली होता है। यह बात सुनकर मैं अपनी जिंदगी के कई पन्ने पलटने लगा। और मुझे याद आता गया। पुराना अनुभव। जिंदगी में कितनी बार हमने धोखा हजार के नोट से खाया है। वैसे आपने भी खाया ही होगा। हमारी फितरत है कि हम हमेशा सिर्फ बाहरी आवरण पर भरोसा करते हैं। हमने स्कूल में फिर कालेज में, शहर में और अब रोज मर्रा की जिंदगी मे देखा है। आम आदमी ऐसे लोगों के आसपास मडराता रहता है। जिसे वह अमीर या ताकतवर मानता है। आदमी को हमेशा लगता है कि अमीर आदमी से दोस्ती रखो। वक्त पर काम आयगा। मुझे याद है कालोनी में एक सज्जन ने कार खरीदी। उसके बाद उनके मिजाज ही बदल गए। लोग उनसे इसलिए सलाम करते कि कभी न कभी उनकी कार लोगों के काम आएगी। और उन्होंने लोगों से सलाम तो दूर बात करना और उन्हें देखना भी कम कर दिया। उन्हें डर था कि कभी न कभी कोई न कोई कार मांगने जरूर आएगा। कुछ लोगों ने उन्हें आजमाया भी। तो कभी बैटरी डाउन थी। तो कभी इंजन मे काम था। वह कार कभी किसी के काम आते मैंने तो नहीं देखी।
अक्सर मैं देखता हूं। लोग नेताओँ। विधायकों और मंत्रियों के आसपास लगातार रहना चाहते हैं। सबको लगता है कि संबंध बने रहे तो अच्छा है । वक्त रहते काम आएगें। और शायद यही वजह है कि संबध बनाने के चक्कर मैं हम अपना स्वाभिमान कब खो देते हैं। पता नहीं चलता। और चापलूसी की सीमा में हम कब पहुंच जाते है। याद नहीं रहता। लेकिन अगर हम यह बात याद रखें। तो शायद जिंदगी बदलेगी। हजार के नोट पर यकीन मत करों। जो ठोस है वही साथी है। चाहे वह पचास पैसे का सिक्का हो। या अभय हो।

Wednesday, July 13, 2011

क्या हम भी इसी तरह मर जाएगें। किसी रोज। बेवजह

मैं बातूनी आदमी हूं। खूब बोलता हूं। लिहाजा बोलने में कभी भी दिक्कत नहीं होती। न झिझक। न शर्म। और बोलने में डर भी नहीं लगता। लेकिन आज कुछ देर तक मैं चुप बैठा रहा। बोल ही नहीं पाउँ। मेरे आसपास बैठे लोगों को लगता रहा। कि मैं नाटक कर रहा हूं। मेरी सिर्फ आंखे भर आती थी। मैं आंसू पीता। पोंछता। फिर कुछ सोंचने लगता। फिर चुप हो जाता ।और इस तरह मैं बहुत देऱ तक चुपचाप बैठा रहा। शायद खौफ में था। फिर कई सारे लोग एक साथ चिल्लाएं। चिंदबरम निकल रहा है। और हम अपना माइक लेकर पीछे पीछे भागे। पर गाड़ी 19 सफदरजंग से निकल कर चली गई। और मैं वापस होश में आया।
अपन कांग्रेस दफ्तर में थे। जब अपने boss का फोन आया। मुम्बई में ब्लास्ट हो गए हैं। तुम गृह मंत्री के घर चले जाओँ। और जो जरूरी था। उन्होंने मुझे फोन पर समझाया। मैं सरपट भागता हुआ। उनके घर के बाहर जम गया। हम जानते थे। वे कुछ बोलेगें नहीं। पहले जाकर अपने अफसरों से हालात समझेंगे। फिर कुछ कहेंगे। सतर्कता के साथ। जिन लोगों को हम नहीं जानते उनके लिए आंसू बहुत मुश्किल से निकलते हैं। लेकिन यह दुख शायद उनके लिए नहीं था। यह डर भी शायद उनके लिए नहीं था। आप से झूठ बोलने की कोई वजह नहीं है। ये डर ये दुख। अपने लिए था। मैं शायद यही सोच रहा था कि क्या हम भी इसी तरह किसी भी रोज मार दिए जाएंगे। बेवजह । क्या हमारी जिंदगी की कोई कीमत नहीं। कोई महत्व नहीं। हम सिर्फ आज शाम तक इसलिए जिंदा हैं क्यों की किसी ने हमें मारने की जरूरत नहीं समझी।
आखिर क्या दोष है। उन लोगों का जो अपनी जिदंगी के रोज मर्रा के संघर्ष करने में व्यस्त है। और इन्हीं संघर्षों के दौरान मार दिए जाते हैं। कुछ सिरफिरे लोग आते है। हमें रेत के घरों की तरह ढहा देते है। और हमारे पास रह जाते हैं। सिर्फ कुछ बयान। जांच के भरोसे। प्रधानमंत्री की संयम की अपील। मुख्यमंत्री की मुआवजे की घोषणा। और अस्पतालों में मरीज। जो मुआवजें को भटकेगें। सालों। विपक्ष के आरोप। और हम जैसे पत्रकारों की कुछ खबरें।
हो सकता है। मैं कुछ डरा हुआ हूं। इसलिए इस तरह की बातें लिख रहा हूं आप को क्या लगता है। कि क्या हल है इस तरह के हादसों को टालने का। हम इस लिए जीएँ कि हम कुछ सार्थक। कुछ रचनात्मक करना चाहते। इस लिए नहीं कि हम अभी तक आतंकवादियों की आँखों में खटके नहीं है।

Tuesday, July 12, 2011

टेक्नालॉजी क्या हमें अपनों से दूर कर रही है।

सुबह उठता हूं। कंप्यूटर चालू करता हूं। नेट के जरिए सारे ई पेपर देखता हूं। अपनी बीट की तमाम खबरें खंगालता हूं। और फिर फोन पर मीटिंग शुरू होती है। इसके बाद खबर करने की तैयारी। और घर से निकलता हूं। इस बीच तमाम google-alerts खोल खोल कर पढ़ता रहता हूं। कहीं कोई खबर बन तो नहीं रही हैं। कहीं कोई खबर अपन से छूट तो नहीं रही है। लिहाजा कई बेव साइट्स खोलता रहता हूं। इस बीच अपने साथी रिपोटर्स को फोन के जरिए टटोलता रहता हूं। जब भी मौका मिलता है कहीं भी टीवी देखने का फायदा उठा ही लेता हूं। फोन पर हर एसएमएस। हर मेल। ध्यान से देखता रहता हूं। खबर बनाई। और फिर घर लौट आए। नहाता बाद में हूं। पहले तमाम चैनल्स देखता हूं। फिर रात में मेल चेक करता हूं। और हां अब ब्लाग लिख रहा हूं। इस बीच फेस बुक पर भी कुछ न कुछ करता रहता हूं। अब इस बीच कहां समय हैं। किसी के लिए। वो पत्नी हो या मां। दादी हो या कोई दोस्त।
टेक्नालॉजी ने हमें धोखा दिया है। कहा तो ये गया था। कि इससे हमारी जिंदगी आसान होगी। जिंदगी सुविधाजनक होगी। लेकिन हुआ उल्टा। हम खाली होने की वजाए। इसमें उलझते चले गए। दफ्तर अब घर पर भी आता है। lap-top की शक्ल में। कंप्यूटर बंद ही नहीं होता। फोन बाथरूम में लेकर भी जाना पड़ता है। एसी के चलते दरवाजें बंद करके सोते है। अब सोते सोते किसी से बातचीत नहीं होती। हां कोई फोन बाहर से आजाए। तो बात अलग है। अब पत्नी के उठाने से पहले ही फोन का अलार्म बज जाता है। कई बार अपना तो कई बार उसका। अपना पहले बजे तो कोई बात नहीं। उसका पहले बजे तो गुस्सा आता है।
आप को खूब याद होगा। जब किसी का जन्मदिन होता था। तो हम कभी चिट्ठी लिखते थे। तो कभी ग्रीटिंग कार्ड भेजते थे। फिर फोन भी कर लेते थे।अब एसएमएस कर देते हैं। वो शुभकामनाएँ रेडीमेड फोन में लिखी आती है। उन्हें सिर्फ हम भेज देते है। अब हम अपनों से मिलने नहीं जाते। हां फेसबुक पर चैट कर लेते है। अब तो अपनों की याद भी किसी कंपनी की मुलाजिम हो गई है। जो सिर्फ संडे की संडे आती है। क्या इस नई दुनिया के चलन ने हमसे सब कुछ छीन लिया है। रिश्ते। सुख। अपनापन। मजा। और थमा दिया है। एक नई टेक्नालॉजी का झुनझुना। जो हम अब छोड़ भी नहीं सकते। और रखते हैं। तो जिंदगी का मजा जाता है। अब आप ही बताइए। इसने हमें अपनों से दूर किया है। या करीब लाई है। अपनी बात हम बताइएगा जरूर।