मैंने सुना है। सेंट थेरेसा एक ईसाई संत हुई हैं। एक बार उन्होंने पूरे गांव में एलान कर दिया। मैं एक बहुत बड़ा चर्च बनाने जा रही हूं। मेरे पास काफी पैसे जमा हो गए हैं। लोगों को हैरत हुई। थेरेसा को उन्होंने कल शाम को भी भीख मांगते देखा था। लिहाजा एक रात में इतने पैसे कहां से आ गए। सभी हैरत में थे। गांव पूरा जमा हो गया। गांव के मुखिया ने पूछा कि तुम्हारे पास कितने पैसे हैं और कहां से आ गए। कथा कहती है कि थेरेसा ने अपना भिक्षा पात्र दिखाया। उसमें तीन पैसे थे। लोगों ने कहा चर्च के लिए पैसे कहां हैं। उसने कहा कि तीन पैसे हैं ना। सभी ने उसका मजाक बनाया कि तीन पैसे में चर्च बना रही है। उस संत ने कहा कि हम तीन शक्तियां है। तीन पैसे और हम। इसके अलावा एक तीसरी शक्ति भी है। लोगों ने कहा कि तीसरी कहां है उसने कहा कि परमात्मा। इस तीसरी शक्ति को लोगों ने अनुभव किया या नहीं पता नहीं। लेकिन परमात्मा को हम रिजल्ट के पहले जरूर अनुभव करते थे।
आजकल स्कूलों में रिजल्ट की तारीख तय नहीं होती। अपने हिसाब से आता रहता है। लेकिन हमारे जमाने में परीक्षा अप्रैल में होती थी। और रिजल्ट तीस अप्रैल को आता था। इन दिनों अपने एक मित्र हैं वे किताबें बैचने का धंधा करते है। वे बताते थे कि परीक्षा खत्म होने और रिजल्ट आने के बीच सबसे ज्यादा अगर कुछ बिकता है तो वह हनुमान चालीसा था। वे जिनके पैपर बिगड़ गए हैं। वे तो भगवान की शरण में होते ही थे। और वे जो दुविधा में हैं। उनका भरोसा भगवान पर कुछ ज्यादा ही होता था। इन्हीं दिनो नवरात्री भी आती थी। हमारे जितने भी पढ़ने लिखने में कमजोर साथी थे। सबके सब नौ दिन का व्रत पूरी लगन से करते थे। इतना ही नहीं देवी से यह भी कह देते थे कि अगर अच्छे नंबर से पास हुए तो अगले साल और भी बेहतर तरीके से उपवास किया जाएगा। मंगलवार को आरती हनुमान जी के मंदिर में खूब धूमधाम से होती थी। शंकर जी को जल अर्पित भी इन्हीं दिनों खूब होता था।
तीस अप्रैल तक सभी धार्मिक काम किए जाते थे। ताकि भगवान पूरा इंसाफ करें। लेकिन शायद भगवान की भी अपनी मजबूरियां होती होगीं। सभी कहां अच्छे नंबर ला पाते थे। क्लास में पहला दूसरा नंबर तो वे लड़किया ले जाती थी जिनके पिता या तो सेना में कर्नल होते ते। या फिर सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर। कुछ डाक्टर इंजीनियर भी थे जिनके बच्चों को भगवान अच्छे नंबर दिला देता था। रिजल्ट लेकर लौटन के बाद हनुमान जी किसी पक्षपात करने वाले दुश्मन से कम नहीं लगते थे। भगवान की आरतियां फिर सूनी हो जाती थी। हां हम में से कुछ उसी दिन जाकर अगले साल कि किताबें जरूर खरीद लाते थे। उसी रात ब्राउन पैपर से कवर भी हो जाती थी। और अगले साल देख लेगें। यह ख्याल मन में आता था। लगभग वैसे ही जैसे नागपंचमी का हारा पहलवान अगले ही दिन नया लंगोट सिलाता है। लेकिन रिजल्ट के साथ कुछ दोस्त भी छूट जाते थे। जिनके पिता का तबादला हो जाता था। और कहकर तो जाते थे कि मिलते रहेगें। लेकिन जो छूट गया वो कहां मिलता है। कुछ चेहरों को आज भी मन तलाशता है। आज तीस अप्रैल है। पुराने रिजल्ट और दोस्त दोनों याद आ रहे हैं।
आजकल स्कूलों में रिजल्ट की तारीख तय नहीं होती। अपने हिसाब से आता रहता है। लेकिन हमारे जमाने में परीक्षा अप्रैल में होती थी। और रिजल्ट तीस अप्रैल को आता था। इन दिनों अपने एक मित्र हैं वे किताबें बैचने का धंधा करते है। वे बताते थे कि परीक्षा खत्म होने और रिजल्ट आने के बीच सबसे ज्यादा अगर कुछ बिकता है तो वह हनुमान चालीसा था। वे जिनके पैपर बिगड़ गए हैं। वे तो भगवान की शरण में होते ही थे। और वे जो दुविधा में हैं। उनका भरोसा भगवान पर कुछ ज्यादा ही होता था। इन्हीं दिनो नवरात्री भी आती थी। हमारे जितने भी पढ़ने लिखने में कमजोर साथी थे। सबके सब नौ दिन का व्रत पूरी लगन से करते थे। इतना ही नहीं देवी से यह भी कह देते थे कि अगर अच्छे नंबर से पास हुए तो अगले साल और भी बेहतर तरीके से उपवास किया जाएगा। मंगलवार को आरती हनुमान जी के मंदिर में खूब धूमधाम से होती थी। शंकर जी को जल अर्पित भी इन्हीं दिनों खूब होता था।
तीस अप्रैल तक सभी धार्मिक काम किए जाते थे। ताकि भगवान पूरा इंसाफ करें। लेकिन शायद भगवान की भी अपनी मजबूरियां होती होगीं। सभी कहां अच्छे नंबर ला पाते थे। क्लास में पहला दूसरा नंबर तो वे लड़किया ले जाती थी जिनके पिता या तो सेना में कर्नल होते ते। या फिर सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर। कुछ डाक्टर इंजीनियर भी थे जिनके बच्चों को भगवान अच्छे नंबर दिला देता था। रिजल्ट लेकर लौटन के बाद हनुमान जी किसी पक्षपात करने वाले दुश्मन से कम नहीं लगते थे। भगवान की आरतियां फिर सूनी हो जाती थी। हां हम में से कुछ उसी दिन जाकर अगले साल कि किताबें जरूर खरीद लाते थे। उसी रात ब्राउन पैपर से कवर भी हो जाती थी। और अगले साल देख लेगें। यह ख्याल मन में आता था। लगभग वैसे ही जैसे नागपंचमी का हारा पहलवान अगले ही दिन नया लंगोट सिलाता है। लेकिन रिजल्ट के साथ कुछ दोस्त भी छूट जाते थे। जिनके पिता का तबादला हो जाता था। और कहकर तो जाते थे कि मिलते रहेगें। लेकिन जो छूट गया वो कहां मिलता है। कुछ चेहरों को आज भी मन तलाशता है। आज तीस अप्रैल है। पुराने रिजल्ट और दोस्त दोनों याद आ रहे हैं।
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