Friday, August 6, 2010

जब एक बच्चे की गुल्लक फूटती है। तब हजार जवान सपने मरते हैं।

राजू भैया किराने की दुकान चलाते हैं। मोहल्ले की किराने की दुकान यानि सब कुछ मिलता है। जब भी कभी हमारे पास समय होता है। मैं अक्सर अपने मोटे भैया कि शिकायत दूर कर देता हूं। जाता हू। उनकी दूकान पर खड़ा हो जाता हूं। कभी आटे की बोरी पर बैठकर चाय पीता हूं। उन्हें कभी गालिब तो कभी कबीर। कभी क्राईस्ट तो कभी मोहम्मद सुना आता हूं। कलमाड़ी से लेकर शीला दीक्षित तक पर उनकी प्रतिक्रिया सुन लेता हूं। वे अक्सर कई चीजों को लेकर परेशान होते हैं। जैसे दो रुपए की सिगरेट लेने आए आदमी से। जो उन्हें अक्सर सौ का नोट देता है। वे जानते हैं। उसकी जरूरत सिगरेट नहीं फुटकर पैसे हैं। उसके जाते ही वे कहते भी हैं। सिगरेट का पैकेट लेगा सामने की दुकान से। और फुटकर लेता है मुझसे। बीबी को दफ्तर जाना होगा। बस का किराया चाहिए ना। सो सिगरेट लेने आ गए। जब वे इस तरह की दिक्कत से दो चार हो रहे थे। तभी एक आदमी एक हाथ में पालीथिन लिए आया। उसमें चिल्लर थी। और उसके पीछे। चल आया। चिल्लर का मालिक। जैसे चिंता में जवान बेटी के पीछे पीछे अक्सर मां चलती हैं।
उस आदमी ने तीन चार पालीथिन मिलाकर जो एक सुरक्षित थैला बनाया था। वह उसने भैया के काउंटर पर रख दिया। उन्होंने पूछा क्या है। वह कुछ बोलता इसके पहले वह बच्चा बोल पड़ा। चिल्लर हैं। मेरे गुल्लक की। 87 रूपए हैं। और दो चार आने भी। भैया चिल्लर देखकर इतने खुश हो गए कि उन्होंने उसे गिनने की भी जरूरत नहीं समझी। पूछा पक्का गिनकर लाए हो। जवाब फिर बच्चे ने ही दिया। पांच बार हमने गिनी है। दो बार पापा ने। भैया ने चिल्लर अपने काउंटर में डाल ली। और उनकी आंखे चमक गई। जैसे आज शाम का मोक्ष उन्हें मिल गया। और चिल्लर की खनक सुनकर उस बच्चें की आंख में मैंने एक ऐसा मरघट देखा। जहां पर किसी हादसे के बाद हजार सपने एक साथ जलते हों। मेरी आँखो में पानी भर आया। लेकिन मैं सिर्फ उस मातम में शामिल हो सकता था। मैं शिव की तरह किसी को जिंदगी नहीं दे सकता। न आदमी को न मरे हुए सपनों को। भैया ने 87 रुपए उसे दिए। और दो चार आने वापस कर दिए. ये नहीं चलेगें। उसने पूरी पवित्रता के साथ जेब में रख लिए। इलाहबाद से लौट रहे किसी सन्यासी के कमंडल में जिस तरह गंगा चलती है। उसी पवित्रता के साथ वे दो सिक्के बच्चे की जेब में खनकने लगे। दुकान के काउंटर पर रखी कई चाकलेंटों की बर्नियों पर उसने नजर दौड़ाई। और फिर उसकी आँखे चुप हो गई। मैं भैया की तरफ देखा। वे न जाने क्या समझे और उस बच्चें को दो टाफियां दे दी। पिता से पैसे भी नहीं लिए। यही दो टाफियां मुआवजा थी। उसकी गुल्लक का।
हो सकता है कि आप को लगे कि मैंने 87 का रुपए का फसाना बना दिया। दिल्ली में कौन इतना गरीब है। जो 87 रुपए के लिए अपने बच्चे की गुल्लक फोड़ता है। और यह रकम भी ऐसी नहीं है। जिसके लिए ब्लाग लिखा और पढ़ा जाए। लेकिन आप अपना बचपन याद करिए। आपने भी कोई गुल्लक कभी न कभी जरूर बनाई होगी। उसमें चिल्लर भी डाली होगी। अब सोचिए कहां से आती है वह रकम। जब कोई रिश्तेदार घर आता है। और कुछ दे जाता है। वे सिक्के जो लेकर आप पूरा बाजार घूमते हैं। कभी कुल्फी खाना चाहते हैं। तो कभी आलू चाट। कभी हरा सर्बत। कभी चमड़े के काले जूते लेना चाहते हैं। तो कभी सुंदर सा बस्ता। कभी रंगीन चश्मा तो कभी चाबीदार हैलीकाफ्टर लेकिन फिर आप तमाम चीजों पर संयम की दीवाल खड़ी कर देते है। और उस चिल्लर को गुल्लक में डाल देते है। कितने बार आप कई घंटे ज्यादा पढ़े है। परीक्षाओं के समय। और आठ आने मिले। कितने बार पिता के साथ घूमने नहीं गए। और सिक्का ले लिया। कितने बार उनके पैर दावे और चिल्लर ले ली।
मैं यकीन के साथ कह सकता हूं। वे 87 रुपए उस बच्चें ने हजार दिनों में जमा किए होगें। और लाखों बार अपनी इच्छाओं के साथ सौदा किया होगा। जब कहीं जाकर इतनी रकम बनती है। जिसमें दो चार आने खोटे भी निकलते हैं। कितने सपने होगें। जो इससे पूरे होने होगें। सपनो की तादाद और उनकी तीव्रता सिर्फ उस बच्चें की आंख में ही दिख सकी। मैं उसे लिख नहीं सकता। लेकिन उस बच्चें को कौन बताए। इसी देश में कलमाड़ी भी रहते हैं. जो कामनवैल्थ खेल करा रहे हैं। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगने लगे हैं। खेलों पर 87 हजार करोड़ रुपए खर्च होगें। लेकिन एक घर ऐसा भी है जो अपनी जरूरतों के लिए बच्चे की गुल्लक फोड़कर 87 रुपए निकाल लेता है। क्या आपको याद है कि कभी आपने भी अपनी गुल्लक फोड़ी हो किसी के लिए। कभी अपनों सपनो पर किसी की जरूरत को जिंदा किया हो। अगर ऐसा कोई वाक्या हो तो हमें लिखिएगा जरूर।

Thursday, August 5, 2010

करोड़ो रुपए देकर खरीदना चाहिए बुरा समय। बहुत कुछ सिखाकर जाता है।

हम जिंदगी में कुछ चीजें नहीं खरीद सकते। इसलिए भी वे कीमती है। लेकिन प्रकृति ने इसका ध्यान रखा है। मुझे नहीं लगता कि दुनिया का कोई भी मैंनेजमेंट गुरू आपको सालों में वह सिखा सकता है। जो बुरा समय कुछ दिनों में सिखा जाता है। लेकिन शायद यह बात परमात्मा को पता थी। इसी वजह से हम सब की जिंदगी में बुरा समय आता है। समय अच्छा या बुरा नहीं होता। सिर्फ हालात हमारे हिसाब से हमें परिणाम नहीं देते। जैसे अगर हमारा रोजगार छुट जाए। परिवार को कोई सदस्य बीमार हो जाए। या ऐसी कोई भी चीज जो हमें दुख देती है। घटित हो तो हमारा बुरा समय शुरू हो जाता है। और यह जो बुरा समय है। यह आपको वह सिखा देता है जो सालों में आप नहीं सीख पाते हैं।
रहीम ने कहा है कि रहीमन विपदा हू भली जो थोरे दिन होए। हित अनहित या जगत में जान पड़त सब कोए। रहीम वैसे भी अपन को इष्ट की तरह लगते हैं। लेकिन रहीम की यह बात जहन में आत्मा की तरह उतरती है। बुरा समय अपने दोस्तों चाहने वालों के चेहरे से तमाम तरह के रंग रोगन उतार देता है। जिसे आप पूरी जिंदगी नहीं उतार सकते। खराब समय के अलावा और कोई विज्ञान ही नहीं है। जिसके चलते आप अपने आसपास रहने वाले लोगों का स्वाभाविक रुप देख सकें। और जिस आदमी में जितनी ज्यादा औपचारिकताएँ होगी वह उतना ही ज्यादा अस्वाभाविक होता है। और उसका रंग सबसे पहले उतरता है। लाओत्से तो कहता है कि इनसब औपचारकिताओं के मलवे में हमारा स्वभाव ही खो गया है। हम असहज होने के आदी हो गए है। अगर घर पर पति का अफसर आ जाए। तो उसे खाना खिलाना ही है। लेकिन अगर वह नौकरी से विदा हो गया है। तो पत्नी कह देगी। हम थक गए हैं। चाय से काम चला लो। यही उसका स्वभाव है। जो आप अफसर रहते नहीं देख पाते।
रजनीश एक जगह कहते हैं कि अगर हम चौबीस घंटे को सिर्फ सोच ले कि हमारे उपर कोई कायदा या नियम लागू नहीं है। तो हम क्या क्या करना चाहेगें। आप शायद हैरान होगें। अपने विचारों पर। आप इतना जानवराना हो सकते है। शायद आपके ख्याल में नहीं आया होगा। लेकिन हम बंधे हैं कुछ नियम कायदो से। हम कुछ और हो गए । जबकि हम हैं कुछ और। हम पड़ौसी की पत्नी को लेकर भागना चाहते हैं। लेकिन भाग नहीं सकते। लिहाजा भाभीजी को हम घऱ जैसा मानते हैं। उनकी मां की तरह इज्जत करते हैं। हम ऐसा ही जताते हैं।
चलिए। बुरा समय हम सभी देखते हैं। लेकिन अक्सर उसका फायदा नहीं उठा पाते। हम भूल जाते है। भगवान ने हमारे लिए विशेष एक्सट्रा क्लास लगाई है। जिंदगी की। इससे बहुत कुछ सीखना है। आप भी शायद कई लोगों को जानते होंगे। जिन्होंने आपके बुरे समय में अपने रंग बदले होगें। बदले थे ना।।

Tuesday, August 3, 2010

38 साल के हो गए हम। दादी ने कहा जुग जुग जियो।

चुपचाप। अपन 38 साल के हो गए। दादी का फोन आया। दस मिनिट पहले ही। कहती थी। जुग जुग जियो भैया। जुग जुग शायद अपभ्रंश है। युग युग का। मैंने पूछा भी इतना कौन जीता है। और कैसे जीता है। उन्होंने कंपकंपाती आवाज में कहा। बेटा इतने साल आदमी नहीं जीता। उसकी कीर्ति जीती है। और शायद वे कुछ सोंचने लगी। फोन चुप था। मुझे लगा कि शायद वे अपनी बेवसी के बारे में सोचती होगीं। कि दुनिया में सब कुछ उनके सोचने से नहीं हो सकता। वे चाह कर भी मेरी उम्र हजारों साल नहीं कर सकती। लेकिन उनका आशीर्वाद की किसी नाम की कीर्ति हजारों साल रहे।
जन्मदिन की रौनक साल दर साल किस तरह फीकी होने लगती है। हमें याद है जैसे कल ही की बात है। स्कूल जुलाई में खुलते थे। और जन्मदिन अगस्त में। वह भी एक तारीख के पास ही। अपन हमेशा मजे मे रहें। जन्मदिन पब्लिक स्कूल में और भी मजा देता है। एक तो उस दिन रंगीन कपड़े पहनने की छूट होती है। सो पूरी स्कूल में आपके रंगीन कपड़े एलान करते हुए चलते हैं। कि आज आपका जन्मदिन है। हर कोई मुस्कराता हुआ देखता है। और हर भला आदमी शुभकानाएँ देता हुआ चलता है। हमारे कान्वेंट स्कूल में जन्मदिन के दिन प्रिंसिपल जन्मदिन वाले बच्चें को स्टेज पर बुलाती थीं। उसकी लंबी आयु और उसके उज्जवल भविष्य के लिए प्रार्थना करती। पूरी स्कूल हैपी बर्थडे गाती। और फिर खूब जोर से तालियां बजती। इसके अलावा अपने किसी एक प्रिय दोस्त के साथ स्कूल के सभी टीचर्स को च़ॉकलेट बांटने की आजादी भी होती। क्लास में भी आप अपने सभी दोस्तों को मिठाई खिलाते और टॉफी बांटते दिन निकालते। अमूमन उस दिन कोई टीचर मारना तो दूर गुस्सा भी नहीं होता था। यानी पूरा दिन मजें में कटता। दादी ड्राईवर हरि अंकल और कंडक्टर दुलीचंद के लिए अलग से मिठाई का थैला बना देती थी। जो मैं उन्हें बस में घुसते ही पकड़ा देता। वे किसी न किसी को उठा कर मुझे खिड़की वाली सीट पर बैठा देते। यानि जन्मदिन माने वीआपी दिन।
लेकिन अब जन्मदिन सिर्फ एक तारीख मालूम पड़ती है। परिवार वालों के फोन। या फिर किसी एक आध भूले बिसरे साथी का फोन। उसमें भी शुभकामनाएँ कम। खुद की तारीफ ज्यादा होती है। कि इतने सालों बाद भी उन्हें हमारा जन्मदिन याद है। जन्मदिन पर हर साल कुछ न कुछ सोचता रहा हूं। कि नया काम कुछ शूरू करूंगा। लेकिन कभी कर नहीं पाया। इस बार सोचता हूं। कि साल भर लिखता रहूंगा। आप लोग आशीर्वाद दीजिए। जो काम 38 साल में नहीं कर पाया। वो अब कर सकूं। यानि साल भर लिखता रहूं। आपके आशीर्वाद का मुझे इंतजार रहेगा।

Friday, July 30, 2010

सिर्फ मनुष्य़ ही अपना स्वभाव बदलता रहता है। और कोई नहीं बदलता।

बचपन में मैंने कहानी सुनी थी। नदी से साधु नहा कर निकल रहे थे। उन्होंने अचानक एक बिच्छू को डूबते हुए देखा। उन्हें उस पर दया आ गई। वे फट से गए। उसे निकालने की कोशिश करने लगे। जैसे ही वह हाथ पर आया। उसने डंक मार दिया। छटपटा कर साधु के हाथ से बिच्छू पानी में गिर गया। यह क्रम कई बार चला। वे जैसे ही उसे अपनी हथेली पर बैठाते। वह उन्हें काटता। उनके हाथ से बार बार वह छूटता जाता था। पास में ही खड़े एक दूसरे साधु ने कहा कि महाराज आप क्या कर रहे हैं। वह अपना स्वभाव नहीं बदलेगा। आप फालतू में परेशान में हो रहे हैं। वह आपको बार बार काट रहा है। फिर भी आप उसे निकालने की कोशिश में लगे हैं। साधू बोले यही तो बात है। कि जब वह अपना स्वभाव बदलने को तैयार नहीं हैं। तो मैं अपना स्वभाव कैसे बदलू।
लेकिन आज की बात कुछ और है। मुझे लगता है पूरी प्रकृति में सिर्फ इंसान ही ऐसी कृति है जो अपना स्वभाव समय और लोगों के हिसाब से बदलता रहता है। आपने कभी नहीं देखा होगा। कि नीम पर आम का फल लग जाए। या फिर इमली पर टमाटर होने लगें। मांसाहारी जानवर सब्जियां नहीं खाते। तो शाकाहारी जानवर मांसाहार नहीं करते। लेकिन इंसान कब शाकाहारी से मांसाहारी हो जाए। पता ही नहीं चलता।
अपन जनसत्ता के समय से बार बार घर भागने के लिए बदनाम थे। कोई उपाय समझ में नहीं आता था। कि दिल्ली में मन कैसे लगे। मैंने एक कोशिश की। अपने बुंदेलखंड के लोगों को खोजा। उनसे दोस्ती की। उनसे मिलने जुलने लगे। मैंने देखा कि हमारे वे दोस्त जो सागर में तो बुंदेलखंडी में बोलते थे। लेकिन दिल्ली आने वाली रेल में बैठते ही उनकी भाषा बदल जाती। और वे खड़ी हिंदी बोलने लगते। उनकी पत्नियां दिल्ली आते आते कपड़े कब और कहां बदल लेती। पता ही नही चलता था। जिन भाभी को हमने सागर स्टेशन पर साड़ी पहने देखा। वे ही दिल्ली में जींस और टीशर्ट पहन कर उतरती थी। यानि स्वभाव के अलावा भी हम अपनी भाषा, अपना पहनावा, अपनी पहचान कितनी जल्दी बदल देते हैं। इसका अंदाजा हमें भी नहीं होता। लेकिन सब कुछ बदल रहा हो। ऐसे में कुछ चीजें थाम कर चलना चाहिए। शायद वक्त रहते कभी काम आए। क्या आप भी कुछ बदले हैं। क्या और कितना। क्यों और कैसे हमें बताना जरूर।

Thursday, July 29, 2010

क्या आपके घर भी आते हैं चिपकू भाईसाहब। चाटू अंकल

पिछले दिनों मैं अपने एक दोस्त के घर बैठा था। प्रोग्राम था। बाहर जाकर खाना खाने का। दोस्त की पत्नी और बच्चे तैयार हो रहे थे। मैं भी अपने मित्र का उसके घर पर ही इंतजार कर रहा था। अचानक घंटी बजी। और हम सब खुश हो गए। कि वह दफ्तर से आ गया होगा। और हम अपने तय कार्यक्रम पर निकल पड़ेगें। लेकिन दरवाजा खोलने गया बंटी कुछ परेशान सा लौटा। मैंने पूछा। क्या हुआ। उसकी शक्ल देखकर मैं कुछ डर सा गया था। वह बोला अरे यार। चाटू अँकल आए हैं। मैंने सोचा। जैसा अपना घर का नाम चूंचूं है। वैसे ही किसी अंकल का नाम चाटू होगा। सो मैंने कहा कि इसमें परेशान होने की क्या बात है। अंकल आए है। तो उन्हें बैठने दो। चाय पानी दो। जब तक तुम्हारे पापा आजएंगे। वह मुझ पर ही गुस्सा हो गया। बोला। अब सब प्रोग्राम खराब हो गया। इतना कहकर उसने गुस्से में चप्पल उतारी और भीतर चला गया।
मुझे पूरा माजरा समझ में ही नहीं आया। कुछ देऱ बाद उनकी आवाज आई। बेटा पानी तो पिला। पता नहीं ....कौन ...पर कोई पानी दे आया। फिर उन्होंने पूछा भाभीजी घर पर है। कब तक आएंगे। साहब। शायद भाभी ने उनको टालने के लिए कहा। एक घंटा लग सकता है। उन्होंने कहा चलो कोई बात नहीं। हम उनका इंतजार कर लेगें। भाभी जी हम चाय पीएगें। फिलहाल। बाकी भाईसाहब को आने दो फिर देखते हैं। आवाज फिर आई। भाभीजी टीवी का रिमोट कहां है। पेपर कहां है। अरे रजनीश की सीडी कहां है। ये सारे प्रश्न उन्होंने एक ही सांस में किए थे। अब बात मुझे कुछ समझ में आने लगी थी। मैंने अपनी भाभी से पूछा। माजरा क्या हैं। उन्होंने बताया कि ये उनके दोस्त है। हर शनिवार को आते हैं। कभी कभी तो रविवार को भी आते है। इनका परिवार यहां नहीं रहता। खामियाजा हमें भुगतना पड़ता है। चाय के समय आते हैं। तो चाय तो पीते ही है। फिर घंटो बोलते रहते हैं। और खाना खाकर जाते हैं। क्या बताए। बहुत चांटते हैं। कई बार तो आपके दोस्त सो भी जाते हैं। लेकिन जब वे उठते हैं। तो ये बैठे ही मिलते हैं।
चाटू अँकल की सुनकर मुझे अपने एक चिपकू भाई साहब याद आगए। सागर में उन दिनों हम युनिवर्सिटी में पढ़ते थे। चिपकू भाई साहब हमसें दो तीन साल बढ़े थे। लेकिन वे हमारी ही क्लास में आ गए थे। उन्हें चिपकने की इतनी गजब बीमारी थी। कि उन्हें देख कई लोगों को मैंने दौड़ते देखा है। और शायद कई बार मैंने भी रास्ते बदले हैं। उनके साथ कई परेशानियां थी। वह बिना रुके। घंटों बोल सकते थे। अगर वो साथ में हैं। तो आप किसी से भी कोई भी बात नहीं कर सकते। बोलने का अधिकार सिर्फ वे अपने पास ही रखते थे। वे सलाह देने से लेकर शेऱ शायरी तक करते थे। वे ऐसे आदमी थे कि वे फुर्सत में भी अच्छे नहीं लगते थे। और एक बार वे मिल जाए। तो फिर घंटो आपसे चिपके रहते थे। आप दुनिया में कोई भी काम बताईए। वे उससे जुड़ा हुआ काम बताकर आपके साथ हो लेते थे। लेकिन इस दिल्ली में जहां हर कोई व्यस्त है। यहां घर पर न कोई चाटूं अंकल आते है। न रास्ते में कोई चिपकू भाई साहब मिलते हैं। क्या आपके घर भी कभी कोई चाटू अँकल या चिपकू भाई साहब आते थे। अगर आते थे हमें बताईएगा जरूर।

Wednesday, July 28, 2010

हमनें पहले ही कहा था। अनुशासन अपनी कूबत के बाहर है।

चलो अच्छा हुआ। हम फिर से फैल हो गए ।इस बार लिखने में। हम जिस तरह से लिखते जा रहे थे। हमें खुद भी अजीब सा लग रहा था। लगातार इतने दिन तक कोई काम हम से सधा ही नहीं था। हम पहले ही कह चुके थे। अनुशासन अपनी कूबत के बाहर की चीज है। लेकिन आप लोगों की प्रतिक्रियाएं। मुझे मजा दे रही थी। सो लिखता गया। लेकिन जो लापरवाही अपन ने सालों से पाली है। उसे खिलाया पिलाया जवां किया है। उसे भी तो अपना रंग दिखाना ही चाहिए। वर्ना हमें भी लगता कि हम कुछ बदल से गए हैं। लेकिन लगातार न लिख पाने से। अच्छा लगा। लगा कि अभी भी हम वहीं है। लापरवाह। अनुशासनहीन। मौजी। और जिस काम को करने की इच्छा न हो। सो नहीं करते। चाहे नुक्सान कुछ भी हो।
आज बहुत दिन बाद कुछ पढ़ा भी । और लिख भी रहा हूं। आयरिश कवि मुनरो को पढ़ रहा था। वो लिखतें हैं। जब भी कोई मरता है। तो मैं ही मरता हूं। और इसलिए कभी बाहर पूछने को मत भेजो कि किसकी अर्थी गुजरती है। मेरी ही अरथी गुजरती है। मुनरो को पढ़कर मुझे बुद्ध अचानक याद आ गए। बुद्ध को मरा हुआ आदमी देखकर लगा था कि मैं ही मर गया। अगर एक आदमी मर गया। तो मैं मर गया। मौत निश्चित है। तो अब जीवन बेकार हो गया। आप नाराज मत होना। आपको लगे। इतने दिन बाद कुछ लिखा। और जीवन की बात छोड़कर मरने की बात करता है। बात जीवन या मौत की नहीं है। बात सिर्फ इतनी सी है। कि जिस दिन हम ये बात समझ ले। ये सत्य समझ ले। उस दिन से हमारी जिंदगी में कई परिवर्तन शुरू हो जाएंगे। हमें लगने लगा कि पद, धन, मकान, कार कलर टीवी। क्या ये सब चीजें इतनी जरूरी है। क्या इनके लिए हमें इतना छल करना चाहिए। इतना कपट। इतना कष्ट।
पिछले कई दिनों से हमारे एक मित्र हमारे पीछे पड़े है। बंटवारे को लेकर। वे लोग अपना घर। जमीन जायदाद। सब बांट चुके हैं। सिर्फ एक मंदिर का अहाता है। जिस पर सबकी नजर है। लेकिन इसे बांटे कैसे। इस पर विवाद है। वे हमारी मदद चाहते हैं। मैंने उनसे पूछा। इसे कौन अपने हिस्से में चाहता है। पांचों भाई। एक साथ बोले। वे चाहते है। सबके अपने तर्क थे। मैंने फिर पूछा। अम्मा और बाबूजी को कौन ले जाएगा। वे आपके लिए और मेरे लिए न सही। लेकिन उन लोगों के लिए वे अब वस्तु ही है। सो मैंने इस भाषा का इस्तेमाल किया। इस पर सब चुप थे। जिन लोगों की संपत्ति पर इतना विवाद है। उन्हें ले जाने के लिए कोई तैयार नही है। क्या हम इस सत्य को भूल जाते है। कि हम भी उसी रास्ते पर हैं। कुछ देर बाद ही सही हमें भी वहीं पहुंचना है। पर शायद हमें यह याद नहीं रहता। अगर याद रहे। तो जिंदगी कुछ बेहतर हो।
चलिए। अगर आपका आशीर्वाद रहा। तो मैं फिर लिखने की कोशिश करता रहूंगा।

Sunday, July 4, 2010

दादी हमारी पीठ पर कील ठुकवा दो। बस्ता बहुत भारी है।

जीबू लाल का फोन आया था। पूछ रहे थे। ब्लाग लिखना क्यों बंद कर दिया। मैंने कहा वक्त नहीं मिलता। जीबू बोले। हमें अपना पास वर्ड दे दो। हम तुम्हारे लिए लिख दिया करेंगे। मैंने पूछा किस विषय पर लिखोगे। बोले विषयों की कमी है क्या। हमारे पास बहुत विषय है। हम स्कूल जो जाते हैं। जीबू लाल हमारे छोटे भाई है। और अब वे पांचवी क्लास में पहुंच गए हैं। उनकी ये बात सुनकर हमें अपने ऊपर एक बार फिर शर्म आई । जो अक्सर आती रहती है। लेकिन पूरी बेशर्मी से मैं उसे पी भी जाता हूं। लेकिन जीबू की बात काम कर गई। मैंने नहाया। और मैं ब्लाग लिखने बैठ गया। हांलाकि कल भारत बंद है। और मुझे खबर करने के लिए सुबह सात बजे जाना है। सो जल्दी उठना होगा।
मुझे याद है जैसे कुछ दिनों पुरानी ही बात हो। जीबू स्कूल से पहले दिन लौटे थे। और हमारी दादी को सुझाव दे रहे थे। बोले दादी। हमारा बस्ता बहुत भारी है। पीठ में कील ठुकवा दो। सारे लोग हंसने लगे। और मैं चुप होकर उसकी पीठ को और बस्ते के वजन को देखता रहा। हम किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं। अपने स्कूलों में इन बच्चों को। क्या बस्तों का बोझ बढ़ाने से हमारे बच्चे ज्यादा समझदार और बेहतर इंसान बन पाएगें। या फिर हम सिर्फ अपनी नाकामी छुपाने के लिए इन पर बोझ डालते जा रहे हैं।
पिछले दिनों हमने एक खबर की थी। खबर एक विज्ञापन पर थी। विज्ञापन था। बच्चों के होमवर्क हमारे यहां पर सस्ते दामों में किए जाते हैं। उनके प्रोजेक्ट्स भी हम बनाते हैं। पता चला होलिडे होमवर्क का कारोबार हर साल वह सज्जन करते हैं। मैं जब मिला तो उन्होंने बताया कि यह काम वे पिछले दस सालों से करते आ रहे हैं। और ऐसे मां बाप जो दोनों नौकरी करते है। वे हमारी मदद लेने अक्सर आते है। होलिडे होमवर्क ही हमें समझ में नहीं आता। जिस छुट्टी में होमवर्क करना हो। वो छुट्टी ही कैसी। हमारे जमाने में अप्रैल में परिक्षाएँ होती थी। तीस अप्रैल को रिजल्ट आता था।दो महीने की खालिस छुट्टियां होती थी। और फिर एक जुलाई को स्कूल खुलता था। लेकिन अब फरवरी में परीक्षाएं होती है। और स्कूल लगना फिर शुरू हो जाता है। तो मानों गर्मी की छुट्टियां न होकर। सिर्फ एक ब्रेक सा मालूम पढता है। और बच्चों में पढ़ाई का तनाव उन छुट्टियों में भी रहता है।
आपको शायद अपनी गर्मियां की छुट्टियां याद होंगी। हम कितना खेलते थे। कितनी मौज करते थे। और कितने तनाव मुक्त थे। न होलिडे होमवर्क थे। न प्रोजेक्ट्स। लेकिन हम एक अजीब सी दौड़ में ऐसे फंसे हैं। कि निकलना बाहर है। दुनिया का हर आदमी अपने बच्चें को अपनी असफलता का तोड़ समझता है। वह तो क्लर्क ही बन पाया लेकिन बेटा कलेक्टर बन जाए। बस यही दोड़ है। जीबू की पीठ पर तो कील नहीं है। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में हमारे माता पिता ही अपने बच्चों की पीठ पर कील ठोंकने लगे। संभलिए। और हमें बताइएगा। कि आप कितने सहमत है। इन बस्तों से और उनके बोझ से।