Thursday, May 13, 2010

कोक और पेप्सी के शोर में गुम हो गया छांछ और आम का पना

सच बोलिएगा। आपको क्या लगता है। जो जिंदगी हम जी रहे हैं। उसे कौन चला रहा है। हमारे संस्कार। हमारे मूल्य। हमारी परंपराए। या फिर विज्ञापन एजेंसिया। मीडिया में छपते विज्ञापन। और हमारे फिल्मी कलाकारों और क्रिकेटर्स की सलाह। आमिर खान ने कह दिया। ठंडा मतलब कोका कोला। और हमने मान लिया। सचिन ने शाहरूख के साथ मिलकर हमसे कह दिया। पेप्सी अच्छी है। तो हम उनके साथ हो गए। किसी ने कहा कि डर के आगे जीत है। तो हमें लगा बात तो सही है। और इस तरह हम इस हजारों करोड़ के इस धंधे में उपभोक्ता बन गए। हम अपनी गाड़ी कमाई उन्हें देते गए। अपना छांछ और आम का पना भूल गए। बस कोक और पेप्सी याद रहा।
पिछले दिनों हम अपने एक दोस्त के घर यू हीं पहुंच गए। वेवजह। गप्पे ठोकनीं थी। हम दोनों मिले और शुरू हो गए। बीच में कुछ पीने की इच्छा हुई। उसने अपनी पत्नी से गुजारिश की। लेकिन उसकी एप्लीकेशन रद्द हो गई। वो शायद किसी सीरियल के अंतिम पड़ाव में थी। वहीं से उन्होंने आवाज दी। फ्रिज में कोक की बोतल है। खुद भी पीलो । आलोक को भी दे दो। और एक गिलास हमें भी। हम इतने दकियानूसी नहीं है। कि बदलाव को पचा न पाए। न ही पुरातनपंथी है। कि कोक के जमाने में भी छांछ पीने की बात कहे। बात इतनी सी है कि जब हमारी संस्कृति बदलती है। तो कितनी तेजी से हमारे सांस्कृतिक मूल्य भी भरभराकर गिरते हैं। किसी रेत के टीले की तरह।
मैने वो जमाना देखा है। कि मेहमान कोई भी हो। अगर उसे कुछ पीना है तो परिवार के लोग मेहनत करके कुछ बना देते थे। घर के हालचाल पूछते थे सो अलग। पहले मां-पिता भाई बहिनों के फिऱ पत्नी के। लेकिन अब तो फ्रिज में ठंडे की बोतल है। निकाल कर पीलो। मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे आप लोग मेरे साथ सोचते हो। मेरी तरह। मुझे याद है। किस तरह से घरों में गर्मी के दिनों में मेगों शैक बनता था। कच्चे आम का पना बनता था। सादा और मसालेदार छांछ बनता था। नींबू लेने हमारे घर लोग न जाने कितनी दूर दूर से आते थे। शिकंजी का अपना एक अलग ही मजा था। ठंडाई तो आप लोगों को याद होगी ही। और इन सबके साथ हमारा एक रिश्ता भी बनता था। कभी छांछ के साथ दादी का। तो ठंडाई के साथ दादा का। लेकिन विज्ञापन के इस शोर में हमारा हाथ छुटाकर ये सब न जाने कहां भाग गए। हम सब भूल गए। हमें सिर्फ इतना ही याद है। ठंडा मतलब कोका कोला।

Wednesday, May 12, 2010

क्या आपको याद आती हैं हाथ में पंखा लिए दादी-नानी। मैंने आज इनवर्टर ले लिया।

मुझे यकीन है। आपको याद होगा। कैसे कुछ सालों पहले तक जब हम अपने घरों में थे। कैसे हमारी दादी। कभी नानी। हाथ में पंखे लेकर डुलाया करती थी। कैसे वह ततुरी वाली गर्मी उस पंखे की हवा में काफुर हो जाती थी। छत पर सोते हम और बहुत देर तक नहीं आती थी नींद। गर्म हवा भी आधी रात तक चला करती थी। और ऐसे में ही हमारी दादी के बुढ़े हो चले हाथ लगातार चलते रहते थे। पंखा हिलाते रहते थे। उस समय यह भी था। दादी के सबसे नजदीक सोने के लिए भी तिकड़म भिढ़ानी पड़ती थी। वजह साफ थी जो दादी के पास सोएगा। वही सबसे ज्यादा पंखे की हवा का मजा उठा पाएगा। हांलाकि दादी इस बात का ध्यान रखती थी। कि हवा सबको बराबर मिले। उस हवा में कहानी बोनस होती थी। और दादी बीच बीच में ठोकती भी रहती थी। कि नींद जल्दी आ जाए। लेकिन हम तो अब दिल्ली में हैं।और मशीनों के सहारे जिंदगी काटते हैं। हर काम के लिए एक नई मशीन चाहिए हमें। कभी कभी लगता है कि शायद हम खुद भी तो एक मशीन ही बन गए हैं।
शीला दीक्षित और उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में भले हलफनामा दाखिल करके कह दे कि दो साल तक हमारे पास बिजली पर्याप्त हैं। बिजली कटेगी नहीं। लेकिन कई मामले तकनीकि होते हैं। आसानी से समझ में नहीं आते। कभी frequency कम हो जाती है। तो कभी लोकल फॉल्ट आ जाता है। यानी बिजली तो कटती ही रहती है। ये बात भी सच है कि हमारी धंधेबाज बिजली कंपनियों को मुनाफा भी तो कमाना है। सो कुछ न कुछ तरीके तो वे खोज ही लेगें। लेकिन ये बात हमें समझते समझते दो महीने लग गए। बिजली कटती रहती और रात को न नींद पूरी होती। न दिन में ठीक से काम। लिहाजा हम इनवर्टर खरीद कर रहीसों की लिस्ट में शामिल हो गए। आप हैं उस लिस्ट में की नहीं।
मशीनें दाम से चलती है। और आदमी भावनाओं से। आपको याद होगा कि कैसे हमारी गर्मी शुरू होती थी। मजे के साथ। लेकिन उस गर्मी में हमारे पास न फ्रिज था। न एसी। न इनवर्टर। फिर भी ठंडे मटके का पानी न जाने केसे ऐसी प्यास बुझाता था कि अंदर का मन तृप्त ही हो जाए। गोबर से लिपे घर। और खपरैल की छतें आग उगलती गर्मी में भी कुछ ठंडक का इंतजाम करती रहती थी। फ्रिज नहीं थे। लेकिन आम और दूसरे फल दादा पानी की हौजों में डालकर ठंडे करते थे। घर के मटकों में कुल्फी जमती थी। और देर रात छत पर दादी कहानी सुनाती थी और पंखे डुलाती थी। लेकिन अब हर चीज के लिए हमारे पास मशीन हैं। लेकिन फिर भी हमारी जिंदगी में इतनी तपिश क्यो हैं। शायद हमसे वे लोग छूटगए जो हमारी जिदंगियों की तपिश खत्म करके हमें बेला की फूल की तरह एक तरावट भरी जिंदगी देते थे। शायद अब भी छत पर दादी पंखे के साथ सो रही होगी। लेकिन हम एसी में करवट बदलते हैं। आपको भी याद आती होगी अपनी दादी और नानी के साथ गर्मी की छत हमें लिखिएगा जरूर।

Tuesday, May 11, 2010

अपमानों से बहुत डरे अब सम्मानों से डरना होगा। क्या कहते हैं आप ?

आज दो घटनाएँ हुई। मेरे पास फोन आया। सबेरे सबेरे। हम आपको सम्मानित करना चाहते हैं। दिल्ली रत्न की उपाधी से नवाजना चाहते हैं। 11 हजार रुपए देगें। यकीन मानिए। उन्होंने ऐसे ही कहा था। और पांच सौ रुपए की शाल। मैं चुप रहा। मुझे पूरे वाक्य का अर्थ कुछ देर बाद समझ में आया। मैंने पूछा। नारियल और फूलों की माला देगें नहीं। या कीमत नहीं बताना चाहते। अब वो चुप हो गया। लगा जितनी गालियां बुंदेलखंड से सीखकर आया हूं। सारी सुना दू। लेकिन किसी को भी अपमानित करके आप भले कुछ देर के लिए खुश हो जाए। लेकिन संतुष्ट नहीं हो सकते। सो मैं चुप ही रहा। पूरे धैर्य के साथ मैने कहा कि मैं इस तरह के सम्मान में यकीन नहीं करता। मेरी खबर देखकर जब कोई दर्शक या मेरा पाठक सिर्फ कह देता है कि सही बात है। मेरे लिए वही सबसे बड़ा सम्मान हैं।
इसके बाद आज दिल्ली सचिवालय में हिन्दी अकादमी का सम्मान समारोह था। उसकी खबर हमें ही करनी थी। हालांकि मुझे लगता है कि इस तरह की खबरें ज्यादातर लोग चाव से नहीं देखते। लेकिन इस सम्मान समारोह को लेकर इतना विवाद था कि इसमें खबर बनती थी। सो अपन पहुंच गए। लेकिन वहां पहुंच कर मेरी सुबह वाली उलझन और ज्यादा बढ गई। मुझे लगा जो काम सुबह मेरे साथ एक धंधेबाज कर रहा था। क्या इस तरह का सम्मान उसी तरह का काम नहीं है। मंच पर मुख्यमंत्री खड़ी है। अपनी सहयोगी मंत्री से बात भी करती जा रही है। बुजुर्ग साहित्यकार जिन्हें चलने में भी परेशानी है। वे मंच पर चले जा रहे हैं। मुख्यमंत्री के सम्मान में हाथ जोड़कर नमस्कार कर रहे हैं। और फूल शाल चैक और एक सर्टिफिकेट नुमा कुछ लेते जा रहे हैं। मुझ इस तरह का सम्मान कुछ समझ में नहीं आया। आप जानते ही हैं कि जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो हम रिपोर्टर बाइट लेने के लिए पीछे भागने लगते है। सो हम भी भागे। एक साहित्यकार से पूछा कि आप में से कुछ लोग सम्मान लेने नहीं आए। क्या कहेंगे। वे बोले मैं सम्मान को ठुकराना उचित नहीं मानता। मैने तो अपना सम्मान ले लिया है। और अगर आप कहीं दो चार सम्मान और दिला दे तो हम उन्हें भी ले लेगें।
कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। मुझे लगा क्या ये वही लोग हैं। जिनमें समाज अपना चेहरा देखता है। क्या यही लोग जो आईने की तरह काम करते है। सरकार से कहते हैं कि देखों तुम्हारा चेहरा पीला हुआ जा रहा है। अपने को संभालो। लेकिन जब हमारे साहित्यकार ही इस तरह के सरकारी सम्मानों से अपने को गौरवांवित महशूस करते है। तब मुझे डर लगता है। क्यों कि यही लोग जो सरकार को ललकार सकते हैं। समाज को ये ही लोग टेर लगाते हैं। इनके अंदर की नसों में बहता खून समाज को क्रांति के लिए ललकारता है। लेकिन अगर ये हीं सत्ताधीशों के आगे इस तरह झुककर उनसे सम्मानित होगें। तो शायद हमारे हुक्मरान इनका भले सम्मान कर दे। लेकिन समाज का सम्मान नहीं कर पाएगे। समाज यानि आखरी पंक्ति में खड़ा आखरी आदमी। मुझे समझ में नहीं आया आपको जो भी लगे मुझे बताइएगा। कि हमें क्या इस तरह के सम्मानों से डरना चाहिए। या इन्हें स्वीकार करना चाहिए।

Monday, May 10, 2010

क्या आपको याद है अपनी परिक्षाएं। कितनी अच्छी नींद आती थी उस रात।

बहुत दिन हो गए होगें। पर फिर भी क्या आपको परिक्षाओं वाली रातें यादे हैं। याद है कितनी अच्छी नींद आती थी उस रात। जब सुबह पेपर हो। छतों पर कितनी ठंडी हवा चलती थी। हवा में भी एक अजीब सी खुशबू।और चाल में भी गजब की खनक। लगता था कि बस आज सो जाते हैं। चाहे फिर पूरी जिंदगी जागते रहेंगे। बिस्तर पर रखी चादर की ठंडक। बहुत दूर से आती न जाने कहां से बेला की खुशबू। और दूर कहीं छत पर बात करते लोग। ठहाका मारते कोई दंपति। और हाथ से किताब गिरने को तैयार।
मैंने विवेक भैया से कहा। कि आज कि रात में तो सो जाउंगा। चाहे भले सुबह फेल हो जाउं। ज्यादा से ज्यादा सप्लीमेंट्री आएगी। परीक्षा देकर पास होजाउंगा। अगले महीने। लेकिन इतनी अच्छी नींद मुझे कभी नहीं आई। और न ही इतनी नशीली रात मैंने कभी देखी। विवेक भैया यानि विवेक पांडे। हम दोनों एक साथ रात को पढ़ते थे। उनका घर तालाब किनारे था। तीसरी मंजिल के ऊपर छत। उस पर हम दोनों के बिस्तर। रात भी क्या गजब श्रृंगार किए थी। बेला का गजरा लगाए। हवा के साथ न जाने कैसी चाल चलती थी। हम एमए अंग्रेजी से कर रहे थे। सुबह कविता का पेपर था। मन में आया कि अगर ऐसी रात सो न सकें तो जीवन भर न कविता समझ पाएगें। और न इतनी मोहक रात महशूस कर सकेंगे। और इतना कहकर आधी रात को चाय पी.... और अपन सो गए।
बाद में मनोविज्ञान पढ़ा। और जिंदगी की कई बातें समझ में आई। जिस चीज से जितना भागों वह उतने ही वेग से पीछा करती है। परिक्षा की उन रातों में कितना मजा आता था। गप्प मारने में। कितना मजा आता था। सोने में। कितनी सुंदर सुबह होती थी। जब दादी पढ़ने को उठाती थी। लगता था आज सो ले तो शायद मोक्ष ही मिल जाए। और देखते देखते परीक्षाएं खत्म हो जाती। और वे सुनहरे दिन बोरियत में बदल जाते। न फिर उन रातों में नींद आती। और न वे सुबह इतनी अच्छी लगती। तपती दोपहरी काटने में भी परेशानी होने लगती। रिजल्ट की चिंता वो अलग।
लेकिन आपको शायद चिंता हो रही होगी कि उस रात में सो गया था। लेकिन रिजल्ट का क्या हुआ। यकीन मानिए। मुझे सबसे अच्छे नंबर कविता में ही मिले। और मैं अंग्रेजी से एमए हो गया। लेकिन उसके बाद उतनी सुंदर रात मैने कभी नहीं देखी। न उतनी अच्छी नींद कभी आई।

Sunday, May 9, 2010

सागर की यादें। नन्हें महाराज, हल्के दाऊ और छोटे उस्ताद

complex का हिंदी शब्द मुझे नहीं पता। कुंठा से वह अर्थ नहीं पहुंचता। मैं दोनों शब्दों का इस्तेमाल कर रहा हूं। आपको जो भी ठीक लगे। उसे ही सही मानिएगा। किसी भी आदमी का व्यक्ति कई बार उसके अंदर की कुठाओं का जोड़ होता है। और मनोविज्ञान मानता है कि कुंठित आदमी unpredictable होता है। अपना inferiorty complex छुपाने के लिए वह कभी भी किसी तरह का व्यवहार कर सकता है। छोटे शहरों और कस्बों में इस तरह के कुंठित लोग समाज के लिए मनोरंजन का उपयुक्त पात्र होते हैं।
अनिल सोनी। अमेरिका की एक कंपनी में Engineering head हैं। उनकी तरक्की हमारे शहर के सभी लोगों के लिए मजा देती है। वे जब से भारत आए हैं। उनसे मिलने की हमें बहुत इच्छा थी। सो हमने उन्हें बुलावा भेजा और वे आगए। सागर की कई यादें ताजी हुई। किस तरह हम चाय पर चाय पीते जाते थे। और गप्पों का सिलसिला चलता रहता था।
सागर कई चीजों के लिए जाना जाता था। गुंडागर्दी के लिए भी हमारा इलाका काफी नामी है। लिहाजा जो गुंडागर्दी करते थे उनके किस्से तो चलते ही थे। लेकिन जो इस काम में अपना नाम नहीं कमा पाए उनके लिए भी यह विषय झूठे किस्से गढ़ने के लिए काफी मौके मुहैया कराता था। कुछ बात आपको स्वाभाविक ही लगती होगीं। जैसे गुंडागर्दी करने वाले लोग हमेशा एक पहलवानी शरीर के मालिक होते हैं। लेकिन कई बार कुछ दुबले पतले लोग भी यह कारनामा कर जाते हैं। हमारे शहर में ऐसे कई लोग थे। जिनकी कद काठी कहीं से भी गुडों जैसी नहीं होती थी। लेकिन उनकी इच्छा हमेशा ऐसी कल्पनाएं करती रहती थी। समाज के कुछ हम जैसे लोग हमेशा से ही इन लोगों से रस लेते रहते थे। और इनकी कल्पनाओं को एक नदी की तरह बहने के लिए रास्ता बनाते जाते थे। जहां से इनकी कल्पनाएं सागर में जा मिलती।
छोटा कद। दुबला पतला शरीर। मुछों पर बल। बेवजह गुस्सा। सिर्फ कमजोंरों पर। शहर के नामी लोगों से दूर दराज की रिश्तेदारी। या फिर पहचान का तुर्रा। लगभग ऐसी ही होते थे। बड्डे। हल्के महाराज। छोटे दाऊ। छोटू उस्ताद। हमारी जमात के पास कई हल्के महाराज थे। इनके पास जाकर सिर्फ बैठना होता है। और लड़ाई झगड़े की बातें शुरू करनी होती थी। अगर आपने दो चार लोगों के सामने हाथ जोड़कर नमस्ते कर ली। या फिर पैर छू लिए। तो आपको बातचीत में की गुना मजा आएगा। हल्के महाराज से बात शुरू करो और फिर सुनो। किस तरह से उन्होंने यूनिवर्सिटी में तलवार लेकर सौ... कई बार दौ सौ लोगों को दौड़ लगवा दी थी। किस तरह उनके नाम से यूनिवर्सिटी में छात्र तो ठीक है। टीचर्स कांपते थे। हल्के महाराज अपने जीवन में कई बार भीड़ में अकेले घुस जाते थे। और दर्जनों लोगों को पीटना शुरू कर देते थे। इस तरह के किस्से घंटो चलते थे। किस तरह से उन्होने अपनी पिछली रेल यात्रा में अकेले ही चार पांच लोगों को पीटा। ये बात अलग है कि फिर उनसे कोई पूछ देता। महाराज लेकिन आप तो पिछले कई सालों से सागर के बाहर ही नहीं निकले। यहीं से बात बिगड़ना शुरू हो जाती।और महाराज सुनने वालों को ही गाली गलौच करने लगते। सवाल फिर पूछा जाता कि आपका साथी कुछ और बता रहा था कि कुछ लोग आपको सिर्फ पूछते हुए आए थे। तो आप डर कर डिपार्टमेंट में महिलाओं की बाथरूम में घुस गए थे। चार घंटे बाद निकले। जब चपरासी दरवाजा बंद करने लगा। बस यही आखरी सवाल होता था। और हल्के महाराज हम लोगों को गालियां बक कर चले जाते। फिर उन्हें हफ्तों लग जाते मनाने में। कई बार नमस्ते करो। कई बार पैर छुओं। जब वे फिर से ट्रैक पर आते थे। लेकिन आज देखने से लगता है कि वे कितने भोले थे। हम लोग सालों उनसे किस्से सुनते रहे। और सुनाते रहे। कितना खरा सोना थे। जो वक्त के साथ कभी खोटे नहीं हुए।
अब मैं घर जाता हूं। तो मेरे जमाने के कई हल्के महाराज। कई छोटे उस्ताद। जिंदगी के सही किस्सों में उलझ कर रह गए हैं। दो जून की रोटी भी जीवन में कितना संघर्ष शुरू कर देती है। अब ये कहानियां उनका चेहरा बताता है। वे चुप है। कितने बार लगता है कि फिर किसी हल्के महाराज के पैर छू लू। उन्हें चाय पिलाउं। उनकी बहादुरी के किस्से सुनू। लेकिन अब समय बदल गया है। अपनी रोज मर्रा की जिंदगी में हर रोज गन्ने की तरह पिसते ऐसे लोगों से अब मजाक करना भी अपराध लगता है। पर लगता है कि किसी दिन अगर मेरा पीर मुझसे प्रसन्न हुआ तो मैं जरूर दुआ करूंगा कि एक दिन के लिए ही सही हमारे इन तमाम उस्तादों को शहर का बादशाह बना दे। ताकि सालों तक दिन के उजाले में देखे इनके सपने पूरे हों। मेरे दादा ने एक बार कहा था। कि गप्प मारने वाला मजाक का पात्र नहीं होता। दया का पात्र होता है। वह अपनी सारी कुंठाए जो कर्म से पूरी नहीं कर पाया। शब्दों से पूरी करता है। आपको भी अपनी जिंदगी में अगर कोई हल्के महाराज मिले। तो उसकी बात पूरी इज्जत से सुनिएगा। और उठते समय इस तरह से नमस्कार करिएगा कि आपको उसकी कही पर यकीन था। मैं भी कोशिश करूगां। कि सागर जाऊं। तो हल्के महाराज को खोजकर उनकी बात सुनू। और जब उठूं। तो इस तरह से कि वे जो भी कह रहे थे। सच ही था। पूरा सच।

Saturday, May 8, 2010

मेरी मां परमात्मा की तरह हर जगह रहती है। और कहीं भी नहीं।

चीन में एक विचारक हुआ है। लाओत्से। उसने ढाई हजार साल पहले कई मूल्यवान चीजें कहीं। उसकी बातें कीमती मालूम पड़ती हैं। वह कहता है। उसे देखे, फिर भी वह अनदिखा रह जाता है। उसे सुने फिर भी वह अनसुना रह जाता है। उसे समझे फिर भी वह अछूता रह जाता है। वह हर जगह है। लेकिन वह दिखता नहीं। सयुंक्त परिवार में मां । हर जगह होती है। लेकिन वह दिखती नहीं। उसके पास मां का दिखावा नहीं है। उसे अच्छी मां साबित होने की कोई जल्दबाजी नहीं है। बच्चें उसके प्रति ही जवाबदेह हों ऐसा कोई आग्रह नहीं है। उसे परमात्मा पर और पारिवारिक मूल्यों पर बराबर का भरोसा है। शायद यही वजह थी कि मैं होश संभालने के बाद भी सालों तक दादी को ही अपनी मां समझता रहा। मां और दादी में आज भी कोई अंतर नहीं कर पाता। दादी के पास ज्यादा रहा। सो उनसे .....लगाव आज भी कुछ ज्यादा ही है।
संयुक्त परिवार सिर्फ इतना नहीं है। जितना दिखता है। एक दरवाजे से सभी घर के अंदर जाए। और बाहर निकले। घर का खाना एक ही चूल्हे पर बनता हो। भगवान एक ही जगह रखे हों। और घर का मुखिया भी एक ही हो। यह तो केवल सतह है। अगर इतना ही समझे तो अज्ञानी ही रह जाओगे। आपको शायद यकीन न हों। मैं शुरू से ही अपनी दादी के पास रहा। मैने जाना ही नहीं कि मां कुछ अलग से होती है। मेरी जरूरतें परिवार पूरा करता रहा। किसने खाना खिलाया। किसने नहलाया। किसने पढ़ाया। किसने घुमाया। मुझे कुछ याद नहीं। मैं चाय का शौकीन बचपन से था। सो किसने कितने बार बनाई कभी गिनती ही नहीं की। लेकिन उन तमाम धुंधली यादों में मां की याद कहीं नहीं है। वह शायद परमात्मा की तरह हर जगह होती थी। लेकिन कभी अपना अहसास नहीं कराती थी।
लाओत्से एक बात और कहता है कि परमात्मा जगत बनाता है। लेकिन उसका कहीं दावा नहीं करता। तो हम कह सकते है कि मां ने भी कभी हम पर अपना दावा ही नहीं किया। मैं दिल्ली में आज भी हर रोज दादी से फोन पर बात करता हूं। जब दिल्ली आया था। तो हर रोज रात आठ बजे एक झूठ बोलता था। दादी मैं घर आ गया हूं। खाना खा लिया है। सोने ही वाला हूं। मैं उन दिनों जनसत्ता में रिपोर्टर था। आप जानते हैं कि रात आठ बजे तो अखबार में खबरें लिखना शुरू होती है। लेकिन वे तसल्ली कर सो जाती थी। और कभी कभार जब वे कहती कि भाभी से भी बात कर लो। तो मैं उनसे हालचाल पूछ लेता। और अपने बता देता। पिछले 13 सालों में उन्होंने एक ही सवाल शब्द बदल बदल कर पूछा है। खाना खा लिया या नहीं।
मैं अब तो 39 साल का होने वाला हूं। लेकिन आज भी जब भी मुझे कुछ भी करने की इच्छा होती है। तो दादी ही दिमाग में आती है। कभी लगता भी है कि कोई बुजुर्ग हमारी छत पर आकर हमें साया दे दे तो दादी ही मन में रहती हैं। मुझे लगता है कि सयुंक्त परिवारों में मां व्यक्ति नहीं विचार होता है। और इसको परिवार में कई लोग बांटते हैं। तुम्हारी मां सिर्फ परमात्मा की तरह तुम्हें देखती है। लेकिन तुम उसको नहीं देख सकते। मां का हिस्सा कभी दादी में है। तो कभी बुआ में। कभी चाची में तो कभी बहिन में। मां अलग से नहीं है। लिहाजा मदर्स डे पर सिर्फ एक ग्रीटिंग कार्ड से काम नहीं बनेगा। मेरे पास ऐसी कोई मां नहीं है। जिसे मैं एक ग्रीटिंग कार्ड देकर खुश कर सकूं। एक गिफ्ट देकर उरिन हो जाउँ। मैं कह सकता हूं। मेरी मां को मदर्स डे की अलग से जरूरत नही है। वह मेरे चारों तरफ हैं। भले मैं उसे देख न पाऊँ। उसकी सुगंध मेरे हर तरफ है। मैं भले उसे महसूस न कर पाऊ। मेरे चारों तरफ उसके प्रेम का इंद्रधनुष हैं। भले मेरी आँखे न देख पाए। वह दिल्ली में भी है। भले मैं उसे छू न पाउं। परमात्मा मुझे भले एक क्षण के लिए ही शक्ति देना लेकिन इस तरह की ही देना कि मैं जिसके लिए कुछ भी करू। उसे अहसास कराने का भी लोभ न करूं। अपना अधिकार न जताऊ। और कुछ अपेक्षा भी न करू। सिर्फ अपना कर्तव्य करता रहूं। मां की तरह। भाभी की तरह।

Friday, May 7, 2010

पिता गाड़ी का एवरैज चैक कराते रहे मैकेनिक से और मैं पेट्रौल फूंकता रहा।

मुझे पहली बार लगा था कि उड़न खटोला में इसी तरह का मजा आता होगा। जब पिता ने पहली बार दो पहिया वाहन लिया। कितना अजीब अनुभव था कि तुम जितना चाहो उतना तेज चला लो। सांस भी न फूले। और मजा भी इतना .....कि बस बयां ही न हो पाए। बात उन दिनों की है जब हम स्कूल में दुनिया दारी समझने लगे थे। और उस समय मुझे वाहन मिला। उपलब्धि था। ठीक उन्हीं दिनों मुझे अपनी एक क्लास की लड़की से प्रेम हो गया था। उसके पिता फौज में थे। और वह कैंट में रहती थी। और हम एक दम बाजार में। यानी कई किलोमीटर का फासला। जो कभी पट न पाया। खैर।
पिता ने जब वाहन खरीदा तो शायद उन्हें लगा होगा कि इसका एवरैज दूसरे वाहनों से अच्छा है। पेट्रोल कम खाएगी। और चलेगी ज्यादा। लेकिन उन्हें जल्दी ही निराशा हाथ लगी। वे पेट्रौल भराकर आते। और कुछ ही समय में गाड़ी में रिजर्व लग जाता। वे कुछ सोचते और फिर अपनी गाड़ी को मैकेनिक के पास ले जाते। वो कुछ ठीक करता। लेकिन दो पहिया वाहन कार की तरह एवरैज दे रहा था। ये बात गाड़ी मैकेनिक को भी समझ न आए। दो पहिया वाहन 14 से 15 किलोमीटर एक लीटर में चलता है। वह अपने बाल खुजाए। लेकिन हर बार कुछ ठीक कर दे। और पिता को भरोसा हो जाए। कि अब गाड़ी ठीक हो गई है। वे पूरे यकीन के साथ पेट्रोल का एवरैज नापते और उनका ये भरोसा जल्दी ही टूट जाता।
प्रेम में भी कितनी परेशानी होती है। हालांकि मोबाइल ने कई परेशानियां दूर की है। हमारे समय में पता ही नहीं चलता कि वह कहां है। बस इतना समन्वय था कि उसे हर शाम वॉक करना है। और एक वाक में आप कितने चक्कर लगा सकते है। एक या दो। लेकिन बाकी चक्कर वॉक शुरू करने वाले के पहले लगाने पढ़ते थे। लेकिन वो शाम। उसकी कोई कीमत नहीं। शाम चार बजने के बाद छह बजे तक का हर मिनिट याद होता था। और फिर किस तेजी से वाहन लेकर भागते थे। और वाक करती हुई वो दूर दिखती। हमारी तपस्या पूरी होती। और शिव वरदान के लिए खड़ा हो जैसे। फिर जब और समझदार हुए तो कई बार तो उसकी कार को घर से लेने और छोड़ने भी जाते थे। उस गाड़ी पर कितनी उपलब्धियां रही। पहली बार जब वह गाड़ी पर बैठी। पहली बार जब वह हमारे साथ बहुत दूर तक घूमने गई। और हां पहली बार जब उसने हमारी गाड़ी को चलाया। हां एक बात और थी। हमारी गाड़ी का एवरैज खराब करने में। उन दिनों हमारे मित्र विवेक पांडे भी प्रेम में थे। सो हमसे जब भी फुर्सत हो तो वह उनके काम भी आती थी।
आज मैं कारों में घूमता हूं। अब गाड़ी में पेट्रौल भराना तनाव की बात भी नहीं होती। आप कह सकते है कि दो पहिया वाहन से कार ज्याद सुविधाजनक है। स्टेटस सिंबल है। लेकिन फिर वह मजा क्यों नहीं आता। क्या करूं फिर से किसी से प्रेम कर लूं। जो वाक पर निकलती हो। और उसे देखने फिर से चक्कर लगाना शुरू करू। लेकिन ये खबरों की डेडलाईन भी तो है। इसका क्या करूं। कुछ सुझाइए। कुछ बताईए। अपने अनुभव भी हमें बताए क्या परेशानी रही आपको अपनी प्रेमिका से मिलने में। आज शायद मेरे पिता को पता चल ही जाएगा। कि गाड़ी का एवरेज खराब नहीं था। बेटा ही कुछ खराब हुआ जा रहा था।