हमारी जान पहचाना थी। जब धीरे धीरे दोस्ती हुई। तो उसने पुराने राजा रानियों की तरह दो बातें कहीं। कभी मुझे संत की तरह प्रवचन मत देना। और कभी पत्रकार की तरह मेरा अतीत न पूछना। न मैं रामायण का दशरथ था। और न महाभारत का भरत। फिर भी मैंने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी। अपना कद ऊंचा करके उसे कभी छोटा नहीं किया। और कभी उसको शर्मिंदा करने की कोशिश भी नहीं की।
मैं करीब 13 साल पहले जनसत्ता में रिपोर्टर बनकर आया था। आप जानते ही हैं। पत्रकारिता में सूत्र होने चाहिए। यानि आपकी जान पहचान हो तभी आप जल्दी सफल हो सकते हैं। लेकिन हम तो दिल्ली में एक ही व्यक्ति को पहचानते थे। हमारी एक दीदी कलेक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। सो वे अपने मकान मालिक के अलावा किसी को न जानती थी। जब हमने खबरें खोजना शुरू किया। तो हमारे एक बडे भाई ने हमें सलाह दी। कि सैक्स की खबरे लोग ज्यादा पढ़ते हैं। और रिपोर्टर का नाम भी लोगों की जुबान पर आ जाता है। इसके अलावा दलालों पर खबर करों। इस तरह की खबरें भी लोकप्रिय होती है। जैसे किसी नेता का झूठा राशनकार्ड बनवा दो। किसी का गलत मृत्यू प्रमाण पत्र। किसी अंधे या अपाहिज व्यक्ति का ड्राइविंग लाइसेंस। सो इस तरह की खबरों में अपन जुट गए।
हमने हाई प्रोफाइल कालगर्ल्स पर खबरें खोजना शुरू किया। और हमारी सुनैना से दोस्ती हो गई। वह फर्राटे से अंग्रेजी बोलती थी। स्टिक से चाईनीज खाना खाती थी। बला की सुंदर। लंबी वाली गोल्ड फ्लेक पीती थी। और ओल्ड मंक रम पीती थी। मध्यप्रदेश के सागर जैसे शहर से आए किसी भी व्यक्ति के लिए यह सब किसी हिंदी फिल्म के पात्र से कम न था।
खबरें बदलने लगी। हमें बीट मिल गई। और कुछ लोगों से जान पहचान भी हो गई। फिर भी कभी कभार हम फोन पर बात कर लेते थे। उसने कहा नहीं लेकिन मुझे लगता बातचीत से और भावनाओं से लगता था कि वह मध्यप्रदेश की है। या फिर उसी तरह के किसी प्रांत की। एक बार आधी रात को फोन आया। हालचाल पूछने के लिए। मैंने हालचाल तो ठीक बताए। लेकिन उसे आवाज ठीक नहीं लगी। मैने कहा हां। कुछ बुखार हैं। मैं घर जाने के लिए आईटीओ पर खड़ा हूं। आटो नहीं मिलता। न बस ही दिखती हैं। उसने कहा तुम बीमार हो । वहीं रुको। मैं तुम्हें घर छोड़ देती हूं। मुझे ये बात साधारण ही लगी। जैसे कोई दोस्त मदद करता हो। वह कुछ ही देर में अपनी कार लेकर मुझे आईटीओ लेने पहुंच गई। उसके साथ एक व्यक्ति और था। वह जो उसका रात भर के लिए ग्राहक था। ये बात उसको बेहद गुस्सा दिला रही थी। कि वह मुझे अब घर तक छोड़ने जाएगी। लेकिन शायद उनके बीच जो भी समझौता हुआ हो। वह मान गया। मैं कार में बैठा। और घर की तरफ बड़ा। अचानक उसने पूछा। तुमने खाना खाया। मैंने कहा नहीं। मैं ढावे पर जाकर खा लूंगा। वह बोली अभी खुला होगा। जवाब हम दोनों जानते थे। मैंने कहा घर में बिस्किट भी होगें। वह बोली दवा खानी हैं। खाना अच्छे से खालों और हौजखास के पास एक व्यक्ति पराठें बनाता है। शायद अभी भी बनाता होगा। मैंने बहुत दिन से देखा नहीं। कार उसने वहीं रोक दी। इस पर ग्राहक भैया तो आग बबूला हो गए। उन्होंने उसे गालियां बंकना ही शुरू कर दिया। मेरे बारे में पूछने लगे। ये तुम्हारा भाई है। पिता है। चाचा हैं। मामा है कौन है। सुनैना ने कहा कि दोस्त है। उसने कहा कि दोस्त है तो इसी के साथ जा। वह बोली ठीक है। उसने उसे अपने पर्स से निकाल कर दस हजार रुपए वापस कर दिए। और वह चला गया।
मैं चुप था। क्या कहूं। मुझे खाना नहीं खाना है। तुम उसके साथ चली जाओं। उसकी बदतमीजी में देखता रहा। उसे पीटता। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। वह भी कार से उतर आई। बोली मैंने भी सुबह से कुछ नही खाया है। आलोक मैं जानती हूं। भूखे रहो तो रात मे नींद नहीं आती। और बीमारी में तो उल्टी भी आती है। पेट भी गैरों की तरह व्यवहार करता है। हमनें खाना खाया। और एक क्रोसिन भी। वह मुझे घर उतार कर वापस चली गई। तबियत के बारे में कुछ दिन तक फोन करती रही। लेकिन मैं आज भी सोचता हूं। कि तेरह साल पहले दस हजार की कीमत आज के 25 हजार के करीब तो होगी। क्या मैं अपने किसी भी दोस्त के लिए 25 हजार रुपए का खाना खिला सकता हूं। इमानदारी से कहता हूं। नहीं। वो जो शरीर बैचती है। वह वैश्या है। हम जो इमान बैचते हैं। रिश्ते। संबंध। भावनाओं को इस चमकीले बाजार में बेचते हैं। हम कौन है। आप बताइये न ? ?
Thursday, May 20, 2010
Wednesday, May 19, 2010
बाबूजी हमारी जिंदगी की कीमत क्या सिर्फ पांच रूपए हैं। मैं चुप रहा। जवाब आप दीजिए।
आज एक अलग तरह के आदमी से मुलाकात हुई। वो अपनी कहानी सुनाता रहा। और मैं पिघलता गया। पहले मैं सतर्क हुआ। फिर मैं एक टक होकर उसे सुनता रहा। वह कभी मुस्कराता। कभी हैरत में मुझे देखकर चुप हो जाता। और अपनी बात कहता रहा। और मैं सुनते सुनते बाद में सिर्फ एक मांस का लौथरा बचा।
मुलाकात हुई। सामान्य परिचय से पता चला कि वह हमारे मध्यप्रदेश का है। फिर क्या था। अपन शुरू हो गए। क्या काम करते हो। घर में कौन कौन है। दिल्ली कैसे आना हुआ। मैं क्या मदद कर सकता हूं। उसने सीधे कहा कि बाबूजी। मौत का खेल खेलता हूं। वो भी पांच रूपए में। आप लोगों को वो भी मंहगा लगता है। मैंने कहा समझा नहीं। उसने बताया बाबूजी प्रदर्शनियां लगती है। उनमें हम मौत का कुंआ बनाते हैं। प्रदर्शनी में एक अस्थायी कुआं बनाया जाता है। उसके पास एक सीड़ी बनाई जाती है। जो करीब सौ फुट की होती है। उस पर मैं चड़ता हूं। अपने विशेष प्रकार के कपड़ों पर आग लगा लेता हूं। नीचे पानी में पेट्रौल डालकर आग लगाई जाती है। और फिर मैं उपर से कूंदता हू। हर रोज अपनी जिंदगी दांव पर लगाता हूं। इसका टिकिट होता हैं। पांच रूपए। वो भी लोगों को मंहगा लगता है।
मैंने बात सुनी। पहली प्रतिक्रिया जताई। कोई अच्छा काम क्यों नहीं कर लेते। वह बोला इस काम में गंदगी क्या है। मैंने कहा मेरा मतलब है सुरक्षित काम। वह बोला आप सुरक्षित हैं क्या। मैंने कहा कि हर रोज तो नहीं मरता। उसने कहा कि मरता तो मैं भी रोज नही हूं। मैं खीज गया। तो फिर तुम्हे दिक्कत क्या है। वो बोला कि लोगों को मरकर दिखाता हूं। और कई बार मारा भी जाता हूं। लेकिन इस खेल की कीमत लोगों को पांच रुपए भी मंहगी लगती है। और लड़की नांचे। तो लोग पांच हजार भी लुटा देते हैं।
बात तो उसने कई बताई। लेकिन कई बातें मुझे पिघला कर चली गई। वह बोला हम कोई भी काम कल पर नहीं छोड़ते। जो खाना है। जो लाना है। जो देना है। जो आजमाना है। हम सभी कुछ आज ही कर लेते हैं। बच्चें को अगर खिलौना दिलाना है। तो हम कल पर नहीं छोड़ते। हमारे परिवार में इस समय तीन विधवाएं हैं। मां । चाची। और छोटी चाची। तीनों लोग कुएं पर मरे। अब मैं घर का खर्च चलाता हूं। लेकिन अब परिवार की तरफ से कुछ निश्चिंत हूं। मेरा छोटा भाई भी कूंदने लगा है। हम दो भाई हैं। लगता हैं किसी रोज मुझे कुछ हो गया। तो अब परेशानी नहीं होगी। छोटा भाई परिवार संभाल लेगा। मैंने पूछा तुम लोगों से शादी करता कौन हैं। उसाका जवाब किसी हैरत से कम नहीं था। बोला मैनें भी प्रेम विवाह किया है। और मैंरे छोटे भाई ने भी। लेकिन वो जाते जाते कह गया कि बाबूजी मेरे पिता मैरे सामने ही कुआं पर गिरकर मरे थे। मैं वो भूल गया। लेकिन जाते हुए एक लोग लुगाई ने कहा था कि आज के पैसे वसूल हो गए। वो हमें याद है। बाबूजी हमारी जिंदगी की कीमत क्या सिर्फ पांच रुपए हैं। मैं चुप था। जवाब आप दीजिए।
मुलाकात हुई। सामान्य परिचय से पता चला कि वह हमारे मध्यप्रदेश का है। फिर क्या था। अपन शुरू हो गए। क्या काम करते हो। घर में कौन कौन है। दिल्ली कैसे आना हुआ। मैं क्या मदद कर सकता हूं। उसने सीधे कहा कि बाबूजी। मौत का खेल खेलता हूं। वो भी पांच रूपए में। आप लोगों को वो भी मंहगा लगता है। मैंने कहा समझा नहीं। उसने बताया बाबूजी प्रदर्शनियां लगती है। उनमें हम मौत का कुंआ बनाते हैं। प्रदर्शनी में एक अस्थायी कुआं बनाया जाता है। उसके पास एक सीड़ी बनाई जाती है। जो करीब सौ फुट की होती है। उस पर मैं चड़ता हूं। अपने विशेष प्रकार के कपड़ों पर आग लगा लेता हूं। नीचे पानी में पेट्रौल डालकर आग लगाई जाती है। और फिर मैं उपर से कूंदता हू। हर रोज अपनी जिंदगी दांव पर लगाता हूं। इसका टिकिट होता हैं। पांच रूपए। वो भी लोगों को मंहगा लगता है।
मैंने बात सुनी। पहली प्रतिक्रिया जताई। कोई अच्छा काम क्यों नहीं कर लेते। वह बोला इस काम में गंदगी क्या है। मैंने कहा मेरा मतलब है सुरक्षित काम। वह बोला आप सुरक्षित हैं क्या। मैंने कहा कि हर रोज तो नहीं मरता। उसने कहा कि मरता तो मैं भी रोज नही हूं। मैं खीज गया। तो फिर तुम्हे दिक्कत क्या है। वो बोला कि लोगों को मरकर दिखाता हूं। और कई बार मारा भी जाता हूं। लेकिन इस खेल की कीमत लोगों को पांच रुपए भी मंहगी लगती है। और लड़की नांचे। तो लोग पांच हजार भी लुटा देते हैं।
बात तो उसने कई बताई। लेकिन कई बातें मुझे पिघला कर चली गई। वह बोला हम कोई भी काम कल पर नहीं छोड़ते। जो खाना है। जो लाना है। जो देना है। जो आजमाना है। हम सभी कुछ आज ही कर लेते हैं। बच्चें को अगर खिलौना दिलाना है। तो हम कल पर नहीं छोड़ते। हमारे परिवार में इस समय तीन विधवाएं हैं। मां । चाची। और छोटी चाची। तीनों लोग कुएं पर मरे। अब मैं घर का खर्च चलाता हूं। लेकिन अब परिवार की तरफ से कुछ निश्चिंत हूं। मेरा छोटा भाई भी कूंदने लगा है। हम दो भाई हैं। लगता हैं किसी रोज मुझे कुछ हो गया। तो अब परेशानी नहीं होगी। छोटा भाई परिवार संभाल लेगा। मैंने पूछा तुम लोगों से शादी करता कौन हैं। उसाका जवाब किसी हैरत से कम नहीं था। बोला मैनें भी प्रेम विवाह किया है। और मैंरे छोटे भाई ने भी। लेकिन वो जाते जाते कह गया कि बाबूजी मेरे पिता मैरे सामने ही कुआं पर गिरकर मरे थे। मैं वो भूल गया। लेकिन जाते हुए एक लोग लुगाई ने कहा था कि आज के पैसे वसूल हो गए। वो हमें याद है। बाबूजी हमारी जिंदगी की कीमत क्या सिर्फ पांच रुपए हैं। मैं चुप था। जवाब आप दीजिए।
Tuesday, May 18, 2010
उम्र छुपाने के लिए छल कपट प्रपंच। आप भी करते है क्या ?
हम टीवी में रिपोर्टर हैं। हमें स्मार्ट दिखना चाहिए। और उम्र दराज न लगें। इसकी भी कोशिश करनी चाहिए। सभी हमसे कहते हैं। उम्र भी अजीब खेल खेलती है। हमारे साथ। शरीर भी किश्त किश्त बदलता है। पहले बाल सफेद हुए। सो हमनें काले किए। गंजे हुए। सो बिग लगा लिया। अब मूछें सफेद हो रही है। सो काट ली। शरीर बेडोल हो रहा है। सो घूमना शुरू करना है। अब लगता है। कुछ दिन बाद चश्मे की बारी है। और फिर दांतो की।
हम कालेज में थे। तभी से बाल गिरना शुरू हो गए। दादी जब भी कोई विज्ञापन देखती। तेल का नाम कागज पर लिख लेती। कुछ दिन तक मुझसे कहती रहती। फिर चिल्लाती रहती। और अंत में खुद ही कहीं से मंगा देती। लेकिन कभी कोई काम गंभीरता से किया ही नहीं। सो वक्त पर तेल भी नहीं डाल पाता था। दादी को पूरी उम्मीद थी। कि वक्त पर अगर तेल को दवाई की तरह इस्तेमाल करूं तो बाल नहीं गिरेगें। लेकिन सब कुछ अपनी इच्छा से कहां हो पाता है। वे देखती रही। बाल गिरते गए। मैं दिल्ली चला आया। और भी लापरवाह हो गया। और धीरे धीरे गंजा हो गया। वे मेरे गंजे सिर को देखती तो दुख उनकी आँखो में साफ झलकता था। लेकिन मैं कुछ कर ही नहीं पाया। हालांकि वे मुझसे पूछती रही कि दिल्ली में बिग मिलते हैं। लेकिन मैं सुनता जाता । लेकिन कभी कुछ किया नहीं। फिर एक बार छोटा भाई आया। मुझे बिग पहना कर चला गया। और हम चालीस साल की जगह वापस अपनी उम्र पा आ गए। तीस के दोबारा हो गए।
हम संभल ही पाए थे। कि बाल सफेद होने लगे। नकली चीज तो और भी जल्दी अपना रंग बदलती है। बिग और भी जल्दी सफेद होने लगा। सो अब बाल काले करने भी शूरू कर दिए। एश्वर्या राय़ कहती है। बाल और भी खूबसूरत हो जाते हैं। उनकी बात मानकर उसी कंपनी का रंग रोगन ले आया।बालों पर रंगदारी करने लगा। अब संकट मूछों पर था। हर रोज सफेद सफेद। लोगों ने सलाह दी है। काट लो। अच्छे लगोगे। सोच रहा हूं। काट ही लूं।
हम जिंदगी में किस तरह से अपने आप को बचाए रखना चाहते है। हम क्यों हर कदम पर छल कपट प्रपंच करना चाहते हैं। हम अपनी उम्र किससे छुपा रहे हैं। हम स्मार्ट किसके लिए बनना चाहते है। ये धोखा हम दुनिया को दे रहे हैं। या अपने आप को। हम किसके लिए अपनी सुंदरता बचाकर रखना चाहते हैं। पता नहीं। मुझे समझ में नहीं आता। मेरी नौकरी है। मुझे ये सब करना ही है।
लेकिन मुझे एक बात हमेशा लगती है। कि क्राईस्ट हो या नानक। कबीर हो यां फिर मोहम्मद। इनकी बातें दुनिया में खूब सुनी गई। लेकिन ये लोग आज के मांपढंड में स्मार्ट नहीं थे। क्या महावीर के कपड़े या फिर बुद्ध की सुंदरता कोई देखता था। शायद नहीं। मुझे लगता है जो सच है वो सुना जाएगा। जो फरेब हैं। उसे कौन सुनेगा। और उसकी आयु भी क्या होगी। जरूरी नहीं है। कि टाई लगाकर अच्छे कपड़े पहनकर जो कहा जाएगा।वो सच होगा। क्या आप भी इस तरह का कुछ कर रहे है। अगर हां तो क्यों। और नहीं तो क्यों नहीं। हमें बताइएगा जरूर।
हम कालेज में थे। तभी से बाल गिरना शुरू हो गए। दादी जब भी कोई विज्ञापन देखती। तेल का नाम कागज पर लिख लेती। कुछ दिन तक मुझसे कहती रहती। फिर चिल्लाती रहती। और अंत में खुद ही कहीं से मंगा देती। लेकिन कभी कोई काम गंभीरता से किया ही नहीं। सो वक्त पर तेल भी नहीं डाल पाता था। दादी को पूरी उम्मीद थी। कि वक्त पर अगर तेल को दवाई की तरह इस्तेमाल करूं तो बाल नहीं गिरेगें। लेकिन सब कुछ अपनी इच्छा से कहां हो पाता है। वे देखती रही। बाल गिरते गए। मैं दिल्ली चला आया। और भी लापरवाह हो गया। और धीरे धीरे गंजा हो गया। वे मेरे गंजे सिर को देखती तो दुख उनकी आँखो में साफ झलकता था। लेकिन मैं कुछ कर ही नहीं पाया। हालांकि वे मुझसे पूछती रही कि दिल्ली में बिग मिलते हैं। लेकिन मैं सुनता जाता । लेकिन कभी कुछ किया नहीं। फिर एक बार छोटा भाई आया। मुझे बिग पहना कर चला गया। और हम चालीस साल की जगह वापस अपनी उम्र पा आ गए। तीस के दोबारा हो गए।
हम संभल ही पाए थे। कि बाल सफेद होने लगे। नकली चीज तो और भी जल्दी अपना रंग बदलती है। बिग और भी जल्दी सफेद होने लगा। सो अब बाल काले करने भी शूरू कर दिए। एश्वर्या राय़ कहती है। बाल और भी खूबसूरत हो जाते हैं। उनकी बात मानकर उसी कंपनी का रंग रोगन ले आया।बालों पर रंगदारी करने लगा। अब संकट मूछों पर था। हर रोज सफेद सफेद। लोगों ने सलाह दी है। काट लो। अच्छे लगोगे। सोच रहा हूं। काट ही लूं।
हम जिंदगी में किस तरह से अपने आप को बचाए रखना चाहते है। हम क्यों हर कदम पर छल कपट प्रपंच करना चाहते हैं। हम अपनी उम्र किससे छुपा रहे हैं। हम स्मार्ट किसके लिए बनना चाहते है। ये धोखा हम दुनिया को दे रहे हैं। या अपने आप को। हम किसके लिए अपनी सुंदरता बचाकर रखना चाहते हैं। पता नहीं। मुझे समझ में नहीं आता। मेरी नौकरी है। मुझे ये सब करना ही है।
लेकिन मुझे एक बात हमेशा लगती है। कि क्राईस्ट हो या नानक। कबीर हो यां फिर मोहम्मद। इनकी बातें दुनिया में खूब सुनी गई। लेकिन ये लोग आज के मांपढंड में स्मार्ट नहीं थे। क्या महावीर के कपड़े या फिर बुद्ध की सुंदरता कोई देखता था। शायद नहीं। मुझे लगता है जो सच है वो सुना जाएगा। जो फरेब हैं। उसे कौन सुनेगा। और उसकी आयु भी क्या होगी। जरूरी नहीं है। कि टाई लगाकर अच्छे कपड़े पहनकर जो कहा जाएगा।वो सच होगा। क्या आप भी इस तरह का कुछ कर रहे है। अगर हां तो क्यों। और नहीं तो क्यों नहीं। हमें बताइएगा जरूर।
Monday, May 17, 2010
आपका तो एक रुपया पानी में गया। हमारी तो पूरी जवानी पानी में चली गई।
बात उन दिनों की हैं। जब हम सागर में रहते थे। और हमारे चाचा सतना में। गर्मी की छुट्टियों में हमारे जैसे छोटे शहरों में लोग अपने चाचा-बुआ के घर जाते हैं। या फिर मामा-मामी से मिलने नानी के घर। हमारे इलाके में हिल स्टेशन का चलन नहीं है। और न ही बच्चें समर कैंप में जाते हैं। जिन रिश्तों की हम सिर्फ साल भर आहट दूर से ही सुनते रहते हैं। उन्हें करीब से देखने का मौका इन छुट्टियों में ही मिलता है। हम भले जाते तो मई जून में थे। लेकिन मिलने का मजा हमें जनवरी से ही आने लगता था। चिट्ठी पत्री तभी से शुरू हो जाती थी। हां इस बीच परीक्षा भी आती और रिजल्ट भी।
सागर से बस रात को करीब दस बजे निकलती थी। और सतना सुबह सुबह पहुंचा देती थी। रात भर का सफर बस से होता था। वैसे चाय का शौकीन में बचपन से ही हूं। और पिता पान के। और हम दोनों को रात में नींद शूरू से ही कम आती है। सो बस में न वे सोते थे। और न हम। मुझे हर स्टेंड पर चाय पीने में ज्यादा ही मजा आता था। जैसे हर दुकान अलग-अलग तरह की चाय का स्वाद देती है। वैसे ही शहर के बदलते ही चाय का स्वाद भी बदलता है। आप भले न माने लेकिन चाय का स्वाद तो दिन और रात में भी अलग अलग मिलता है। उसी दुकान पर चाय आप दिन में पीयें तो अलग। और रात में उसका स्वाद अलग। लिहाजा अपनी तलब तो बस के सागर निकलते ही शुरू हो गई थी। मेरे साथ एक बात और है। मैंने कभी चाय को मना नहीं किया। और मुझे चाय कभी खराब नहीं लगती। सिर्फ एक बार ऐसा हुआ है। जब हम जनसत्ता में थे। तो हमारे गुरू सुधीर जैन सर भी उतने ही चाय के शौकीन हैं। जितने हम। हम दोंनो कई बार चाय पीने जाते थे। एक बार हमने चाय पी। और सुधीर सर केंटीन वाले के किचिन में चले गए। उन्होंने कहा सिर्फ तुम इतना बताओ की इतनी खराब चाय तुमने बनाई कैसे। इस तरह के मौके एक आध बार ही आए हैं। वर्ना चाय मुझे अच्छी ही लगती है। कई बार ऐसा भी होता है कि आप किसी के घर जाते हैं। तो चाचा या भैया या फिर आपके मित्र चाय बनाने को कहते हैं। और काम कर रहीं चाची या भाभी पूरे बेमन से खराब चाय बनाती है। मुझे वह चाय भी कभी खराब नहीं लगी। पूरी बेशर्मी के साथ में वह आज भी पीता हूं।
बस सागर से चलने के बाद आधी रात को छतरपुर में रुकी। हम चाय पीने फटाफट उतर गए। पिता को चिंता थी। आधी रात । अजनबी शहर। वो भी बस स्टेंड। हालांकि चाय पीने की उनकी भी इच्छा थी। एक ठेला देखकर मुझे रेगिस्तान में पानी मिलने की खुशी का आभास हुआ। और में लपक कर गया। मेंरे पीछे पीछे पिता भी थे। उसने चाय बनाई या बनी हुई थी। उसे ही गर्मी कर दी। मुझे याद नहीं। लेकिन अजीब बात थी। चाय का रंग तो चाय जैसी ही था। लेकिन इतनी बेस्वाद चाय। मैंने कम ही पी थी। मैं फिर भी मजे से पी ही गया। पिता हल्के से नाराज हुए। कहा कितना खराब चाय पिलाई। तुमने। चाय का स्वाद ही नहीं था। गर्म पानी था। हमार एक रूपए पानी में चला गया। चाय वाला भी गजब का था। उसने खराब चाय के लिए कोई सफाई नहीं दी। न ही कोई दलील। पर पूरी अकड़ के साथ बोला। बाबूजी। आपका तो एक रूपए पानी में गया। हमारा सोचिए। हमारी तो पूरी जवानी ही पानी मे चली गई। जब से शादी हुई है। सिर्फ दो रात ही घर पर सोया हूं। पूरी जवानी इसी स्टेंड पर काट दी। हम आपको चाय नहीं पिलाते। अपनी जवानी घोल घोल कर पिला रहे हैं। बस ने हार्न बजाया। हम आकर बस में बैठ गए। बस चल दी। लेकिन उस आदमी का चेहरा। उसकी चाय का स्वाद। और उसका जवाब। मुझे लगता है। जैसे किसी ने अभी अभी कहा हो। मुझे आज भी समझ में नहीं आता। हम उस रात एक रुपए में खराब चाय पीकर आए थे। या किसी आदमी की जवानी। किसी सुहागन की कुवारीं रात।
सागर से बस रात को करीब दस बजे निकलती थी। और सतना सुबह सुबह पहुंचा देती थी। रात भर का सफर बस से होता था। वैसे चाय का शौकीन में बचपन से ही हूं। और पिता पान के। और हम दोनों को रात में नींद शूरू से ही कम आती है। सो बस में न वे सोते थे। और न हम। मुझे हर स्टेंड पर चाय पीने में ज्यादा ही मजा आता था। जैसे हर दुकान अलग-अलग तरह की चाय का स्वाद देती है। वैसे ही शहर के बदलते ही चाय का स्वाद भी बदलता है। आप भले न माने लेकिन चाय का स्वाद तो दिन और रात में भी अलग अलग मिलता है। उसी दुकान पर चाय आप दिन में पीयें तो अलग। और रात में उसका स्वाद अलग। लिहाजा अपनी तलब तो बस के सागर निकलते ही शुरू हो गई थी। मेरे साथ एक बात और है। मैंने कभी चाय को मना नहीं किया। और मुझे चाय कभी खराब नहीं लगती। सिर्फ एक बार ऐसा हुआ है। जब हम जनसत्ता में थे। तो हमारे गुरू सुधीर जैन सर भी उतने ही चाय के शौकीन हैं। जितने हम। हम दोंनो कई बार चाय पीने जाते थे। एक बार हमने चाय पी। और सुधीर सर केंटीन वाले के किचिन में चले गए। उन्होंने कहा सिर्फ तुम इतना बताओ की इतनी खराब चाय तुमने बनाई कैसे। इस तरह के मौके एक आध बार ही आए हैं। वर्ना चाय मुझे अच्छी ही लगती है। कई बार ऐसा भी होता है कि आप किसी के घर जाते हैं। तो चाचा या भैया या फिर आपके मित्र चाय बनाने को कहते हैं। और काम कर रहीं चाची या भाभी पूरे बेमन से खराब चाय बनाती है। मुझे वह चाय भी कभी खराब नहीं लगी। पूरी बेशर्मी के साथ में वह आज भी पीता हूं।
बस सागर से चलने के बाद आधी रात को छतरपुर में रुकी। हम चाय पीने फटाफट उतर गए। पिता को चिंता थी। आधी रात । अजनबी शहर। वो भी बस स्टेंड। हालांकि चाय पीने की उनकी भी इच्छा थी। एक ठेला देखकर मुझे रेगिस्तान में पानी मिलने की खुशी का आभास हुआ। और में लपक कर गया। मेंरे पीछे पीछे पिता भी थे। उसने चाय बनाई या बनी हुई थी। उसे ही गर्मी कर दी। मुझे याद नहीं। लेकिन अजीब बात थी। चाय का रंग तो चाय जैसी ही था। लेकिन इतनी बेस्वाद चाय। मैंने कम ही पी थी। मैं फिर भी मजे से पी ही गया। पिता हल्के से नाराज हुए। कहा कितना खराब चाय पिलाई। तुमने। चाय का स्वाद ही नहीं था। गर्म पानी था। हमार एक रूपए पानी में चला गया। चाय वाला भी गजब का था। उसने खराब चाय के लिए कोई सफाई नहीं दी। न ही कोई दलील। पर पूरी अकड़ के साथ बोला। बाबूजी। आपका तो एक रूपए पानी में गया। हमारा सोचिए। हमारी तो पूरी जवानी ही पानी मे चली गई। जब से शादी हुई है। सिर्फ दो रात ही घर पर सोया हूं। पूरी जवानी इसी स्टेंड पर काट दी। हम आपको चाय नहीं पिलाते। अपनी जवानी घोल घोल कर पिला रहे हैं। बस ने हार्न बजाया। हम आकर बस में बैठ गए। बस चल दी। लेकिन उस आदमी का चेहरा। उसकी चाय का स्वाद। और उसका जवाब। मुझे लगता है। जैसे किसी ने अभी अभी कहा हो। मुझे आज भी समझ में नहीं आता। हम उस रात एक रुपए में खराब चाय पीकर आए थे। या किसी आदमी की जवानी। किसी सुहागन की कुवारीं रात।
Sunday, May 16, 2010
अक्षय तृतीया। न घर में नया मटका है। न दिल्ली में दादी
हमारे त्यौहार बदलते जा रहे हैं। सो उनको मनाने का ढंग भी। और पंचाग भी। अब हमारे त्यौहार दादी के पंचाग से नहीं मनते। बाजार के कैलेंडर तय करते हैं। हमारे लिए अब वैलेंटाइन डे। मदर्स डे। फादर्स डे। फ्रैंडशिप डे। ज्यादा बड़े त्योहार हैं। बजाय अक्षय तृतिया जैसे कसबाई त्यौहारों के। हमारे बुंदेलखंड में परंपरा है। कि इस दिन घर में नया मटका आता है। और हम अक्षय तृतीया से मटके का पानी पीना शुरू कर देते हैं। लेकिन हमारी परंपराएं किसी पुरानी कापी में लिखी इबारत की तरह हल्की होती जा रही है। हालांकि एक दिन ऐसा आएगा। जल्दी ही। जब किसी फ्रिज बनाने वाली कंपनी को यह त्योहार समझ मे आएगा। और बाजार इसकों अपने रंग में रंग लेगा।
हमने बचपन से देखा इस त्यौहार के कुछ दिन पहले से ही पहचान के कुम्हार घर आते थे। जैसे बड़े शहरों में फैमली डाक्टर होते हैं। वैसे कस्बों में फैमली कुम्हार भी होते हैं। लिहाजा हमारी फैमली का कुम्हार अक्षय तृतिया की आहट होते ही। नया मटका घर दे जाता था। और पानी पीने के लिए हमें इसका इंतजार रहता था।और फिर दादी इसकी पूजा करती। साफ पानी से धोती। और पानी भरकर रख देती। पहले दिन का पानी देवता पीते। दूसरे दिन हम सब। लेकिन पहले दिन का पानी इतना सौंदा होता था। मिट्टी की इतनी खुशबू कि देवताओं से जलन होती। और मैं अक्सर पहले दिन का पानी चोरी करके पी ही लेता था। जब बड़ा हुआ तो विज्ञान की क्लास में पता लगा कि पहले दिन मिट्टी के घड़े का पानी पीने से पत्थरी हो सकती है। तब जाकर ये परंपरा समझ में आई। लेकिन दिल्ली में आज अक्षय तृतीया थी। सो खबरों का तनाव था। दस हजार से ज्याद शादियां। टेंट की परेशानी। जगह की परेशानी। पंडित की परेशानी और ट्रैफ्रिक जाम की बात तो थी ही। लिहाजा इन तमाम परेशानियों को कैसे कवर कराएं। कौन सा रिपोर्टर कहां भेजे। हम इसी में फंसे रहे। और भूल ही गए। कि नया मटका भी इसका अंग हैं। लेकिन दिल्ली में अब वे परपंराए कहां। सो न घर में नया मटका है।और न दिल्ली में दादी।
हमने बचपन से देखा इस त्यौहार के कुछ दिन पहले से ही पहचान के कुम्हार घर आते थे। जैसे बड़े शहरों में फैमली डाक्टर होते हैं। वैसे कस्बों में फैमली कुम्हार भी होते हैं। लिहाजा हमारी फैमली का कुम्हार अक्षय तृतिया की आहट होते ही। नया मटका घर दे जाता था। और पानी पीने के लिए हमें इसका इंतजार रहता था।और फिर दादी इसकी पूजा करती। साफ पानी से धोती। और पानी भरकर रख देती। पहले दिन का पानी देवता पीते। दूसरे दिन हम सब। लेकिन पहले दिन का पानी इतना सौंदा होता था। मिट्टी की इतनी खुशबू कि देवताओं से जलन होती। और मैं अक्सर पहले दिन का पानी चोरी करके पी ही लेता था। जब बड़ा हुआ तो विज्ञान की क्लास में पता लगा कि पहले दिन मिट्टी के घड़े का पानी पीने से पत्थरी हो सकती है। तब जाकर ये परंपरा समझ में आई। लेकिन दिल्ली में आज अक्षय तृतीया थी। सो खबरों का तनाव था। दस हजार से ज्याद शादियां। टेंट की परेशानी। जगह की परेशानी। पंडित की परेशानी और ट्रैफ्रिक जाम की बात तो थी ही। लिहाजा इन तमाम परेशानियों को कैसे कवर कराएं। कौन सा रिपोर्टर कहां भेजे। हम इसी में फंसे रहे। और भूल ही गए। कि नया मटका भी इसका अंग हैं। लेकिन दिल्ली में अब वे परपंराए कहां। सो न घर में नया मटका है।और न दिल्ली में दादी।
Saturday, May 15, 2010
आप शायद इसे पागलपन कहेंगे। मैं इसे अपनापन कहता हूं।
आपको शायद यह घटना झूठ लगेगी। या फिर पागलपन। लेकिन घटना भी सच है। और मैं इसे अपनापन मानता हूं। एक तरह की प्रेम की हद भी आप कह सकते हैं। मुझे बेघर हुए। करीब 13 साल होने को हैं। लेकिन घर के लोग बताते हैं। खाने पीने के सामानों में आज भी दादी अपना हिस्सा लगाती है। अलग तरह का पागलपन इसलिए आप कह सकते हैं कि मैं दिल्ली में हूं। और फिर खाने पीने की चीजों में हिस्सा क्यों। लेकिन परिवार और साधना इसी तरह के दस्तूरों से मजबूत होती चलती है। वह शायद परिवार के बाकी लोंगों को यह अहसास नहीं होने देना चाहती। कि मैं परिवार का हिस्सा नहीं हूं। मै बाहर हो गया हूं।
हमने बचपन से देखा है। आप लोगों ने भी देखा ही होगा। किस तरह से परिवार में कोई भी सामान आता है। तो हर आदमी का उसमें हिस्सा होता है। परिवारों में लूट या जंगलराज नहीं चलता। जो नहीं है। हिस्सा उसका भी होता है। चाहे मिठाई हो या फिर समोसा। दादी ने रसगुल्ले बनाए हों। या पिता जलेबी लाए हों। परिवार में हर चीज बंटती है। सिर्फ कुंती ने द्रौपदी भाइयों में नहीं बांटी थी। हम आज भी कस्बों में जलेबी तक बांटकर ही खाते हैं। मैने देखा है कि दादी किस तरह से हर आदमी का बराबर का हिस्सा लगाती थी। और आखरी हिस्सा जो हर बार कम बंचता था। वो उसका होता था। या कई बार बंटते बंटते वह हिस्सा ही खत्म हो जाता था। लिहाजा ये सबक हमने बचपन में ही सीख लिया था कि जब बांटने की जिम्मेदारी हो तो लेने में पीछे रह जाना। यही दस्तूर हैं। जिम्मेदारी का। बड़े होने का।
मुझे याद आता है। अपने वो दिन जब अपने हिस्से में मौज ही मौज थी। रंगीन कंचे। कई पतंगे। टिकली फोड़ने वाला तमन्चा। माचिस की खाली डिब्बियां। गुल्लक। दादी और बुआ के पास कहानियों का बैंक। पिता के पास खिलौनो की लिस्ट। लेकिन अपने हिस्से में किसने ये नौकरियां लिख दी। ये तनाव। दूसरे को मारकर आगे बढ़ने की लगातार कोशिश। ऐसी दौड़ जिसमें भागने के लिए इंसानियत दफन करना पड़े। जिंदगी का ये हिस्सा मजा नहीं देता। सिर्फ तनाव देता है। और पीछे पीछे आती है बीमारियां। बहिन ने फोन पर बताया है। पिताजी पसेरी भर आम लाए हैं। उन आमों में भी दादी ने अपना हिस्सा अलग बचा कर रखा है। लगता है जिंदगी में कभी हार कर। कभी थक कर। घर वापस जाने की इच्छा हो। तो पूरी इज्जत और विश्वास के साथ वापस लौट सकूंगा। सोचकर कि दादी ने मेरे हिस्से का आम बचाकर रखा है।
हमने बचपन से देखा है। आप लोगों ने भी देखा ही होगा। किस तरह से परिवार में कोई भी सामान आता है। तो हर आदमी का उसमें हिस्सा होता है। परिवारों में लूट या जंगलराज नहीं चलता। जो नहीं है। हिस्सा उसका भी होता है। चाहे मिठाई हो या फिर समोसा। दादी ने रसगुल्ले बनाए हों। या पिता जलेबी लाए हों। परिवार में हर चीज बंटती है। सिर्फ कुंती ने द्रौपदी भाइयों में नहीं बांटी थी। हम आज भी कस्बों में जलेबी तक बांटकर ही खाते हैं। मैने देखा है कि दादी किस तरह से हर आदमी का बराबर का हिस्सा लगाती थी। और आखरी हिस्सा जो हर बार कम बंचता था। वो उसका होता था। या कई बार बंटते बंटते वह हिस्सा ही खत्म हो जाता था। लिहाजा ये सबक हमने बचपन में ही सीख लिया था कि जब बांटने की जिम्मेदारी हो तो लेने में पीछे रह जाना। यही दस्तूर हैं। जिम्मेदारी का। बड़े होने का।
मुझे याद आता है। अपने वो दिन जब अपने हिस्से में मौज ही मौज थी। रंगीन कंचे। कई पतंगे। टिकली फोड़ने वाला तमन्चा। माचिस की खाली डिब्बियां। गुल्लक। दादी और बुआ के पास कहानियों का बैंक। पिता के पास खिलौनो की लिस्ट। लेकिन अपने हिस्से में किसने ये नौकरियां लिख दी। ये तनाव। दूसरे को मारकर आगे बढ़ने की लगातार कोशिश। ऐसी दौड़ जिसमें भागने के लिए इंसानियत दफन करना पड़े। जिंदगी का ये हिस्सा मजा नहीं देता। सिर्फ तनाव देता है। और पीछे पीछे आती है बीमारियां। बहिन ने फोन पर बताया है। पिताजी पसेरी भर आम लाए हैं। उन आमों में भी दादी ने अपना हिस्सा अलग बचा कर रखा है। लगता है जिंदगी में कभी हार कर। कभी थक कर। घर वापस जाने की इच्छा हो। तो पूरी इज्जत और विश्वास के साथ वापस लौट सकूंगा। सोचकर कि दादी ने मेरे हिस्से का आम बचाकर रखा है।
Friday, May 14, 2010
पिता ने कहा। छुट्टी के दिन भी एक्सट्राक्लास। ये इस साल फेल हो जाएगा।
क्या आपको याद है। आपने कभी छुट्टी को कोसा है। जिंदगी में कभी ऐसा दौर रहा हो।जब छुट्टी दुश्मन लगी हो। हम यूं तो हफ्ते भर छुट्टी का इंतजार करते है। लेकिन कभी छुट्टी का दिन कटता ही न हो। लगता हो कब ये खत्म हो। जिंदगी में कभी आपको संडे दुश्मन लगा है। शायद ये सब हुआ होगा। याद करिए। उन दिनों जब आप किसी से टूटकर प्रेम करते थे। और छुट्टी के दिन वो न मिले। तो दिन ही खराब गुजरता था। आया कुछ याद।
संडे की शाम को अपने घर में घुसते ही जा रहे थे। पिता मिल गए दरवाजे पर। पूछा कहां थे। दिनभर दिखे नहीं। मैने कहा युनिवर्सिटी गया था। संडे को ? उन्होने स्वाभाविक प्रश्न पूछा। हमने कहा। एक्सट्राक्लास थी। वे बोले संडे को। मैने कुतर्क किया। एक्सट्राक्लास तो संडे को ही लगती है। आम दिनों में तो क्लास ही होती है। वे बोले बेटा हम भी युनिवर्सिटी में कई साल पढे। लेकिन संडे को कभी एक्स्ट्रक्लास न लगी। मैंने कहा अब पढ़ाई कठिन हो गई है। वे बोले कठिन हो गई है। या बदल गई है। दादी गुस्से में थी। लड़का छुट्टी के दिन भी पढ़ने गया था। दिन भर के बाद लौटा है। भूखा प्यासा। तुम पुलिस वालों की तरह प्रश्न पूछे जा रहे हो। वे दादी के आगे चुप हो गए। लेकिन दादी से कहा कि संडे के दिन भी ये एक्सट्रा क्लास जा रहा है। इस साल इसका फेल होना तय है।
बात उन दिनों की है। जब हम युनिवर्सिटी में थे। और जमकर प्रेम के रंग में रंगे थे। अपनी क्लास उन दिनों प्रीरियड के हिसाब से नहीं चलती थी। गर्ल्स बस के पहले चक्कर से शुरू होती थी। और आखरी चक्कर पर खत्म होती थी। हालांकि घर वाले भी परेशान थे। कि यूनिवर्सिटी में आजकल इतनी पढ़ाई हो रही है। दादी सुबह सुबह उठकर टिफिन भी बना देती थी। उन्हें लगता था कि लड़का दिनभर के लिए पढ़ाई करने जा रहा है। मैं उनको बता भी देता था कि हमारी क्लास में कुछ लड़के हास्टल के भी है। जिन्हें अच्छा खाना नहीं मिलता। हमें दादी की इस कमजोरी का पता था। सो वे खूब सारा खाना रख देती थी। वो अपन को दिनभर के लिए हो जाता था। लेकिन मामला छुट्टी पर उलझता था। सो अपन को पता चला कि जब कोर्स पूरा नहीं होता है। और परिक्षाएं समय पर होनी हो। तो शिक्षक एक्सट्राक्लास लगाकर कोर्स पूरा करते हैं। लिहाजा फिर क्या था। हमारा कोर्स तो पहले से ही पीछे चल रहा था। और इस विषय में तो आप जितनी क्लास पढ़े उतनी ही कम है। जिंदगी भी अजीब चीज है। जिन विषयों की क्लास अटेंड करने आप नहीं जाते है। उनमें तो पास हो जाते है। और जिस जिंदगी की आप एस्कट्राक्लास भी करते हैं। उसमें फेल हो जाते है। मुझे आपका पता नहीं। लेकिन अपन तो फेल ही हो गए। उस साल नहीं। जिंदगी में।
संडे की शाम को अपने घर में घुसते ही जा रहे थे। पिता मिल गए दरवाजे पर। पूछा कहां थे। दिनभर दिखे नहीं। मैने कहा युनिवर्सिटी गया था। संडे को ? उन्होने स्वाभाविक प्रश्न पूछा। हमने कहा। एक्सट्राक्लास थी। वे बोले संडे को। मैने कुतर्क किया। एक्सट्राक्लास तो संडे को ही लगती है। आम दिनों में तो क्लास ही होती है। वे बोले बेटा हम भी युनिवर्सिटी में कई साल पढे। लेकिन संडे को कभी एक्स्ट्रक्लास न लगी। मैंने कहा अब पढ़ाई कठिन हो गई है। वे बोले कठिन हो गई है। या बदल गई है। दादी गुस्से में थी। लड़का छुट्टी के दिन भी पढ़ने गया था। दिन भर के बाद लौटा है। भूखा प्यासा। तुम पुलिस वालों की तरह प्रश्न पूछे जा रहे हो। वे दादी के आगे चुप हो गए। लेकिन दादी से कहा कि संडे के दिन भी ये एक्सट्रा क्लास जा रहा है। इस साल इसका फेल होना तय है।
बात उन दिनों की है। जब हम युनिवर्सिटी में थे। और जमकर प्रेम के रंग में रंगे थे। अपनी क्लास उन दिनों प्रीरियड के हिसाब से नहीं चलती थी। गर्ल्स बस के पहले चक्कर से शुरू होती थी। और आखरी चक्कर पर खत्म होती थी। हालांकि घर वाले भी परेशान थे। कि यूनिवर्सिटी में आजकल इतनी पढ़ाई हो रही है। दादी सुबह सुबह उठकर टिफिन भी बना देती थी। उन्हें लगता था कि लड़का दिनभर के लिए पढ़ाई करने जा रहा है। मैं उनको बता भी देता था कि हमारी क्लास में कुछ लड़के हास्टल के भी है। जिन्हें अच्छा खाना नहीं मिलता। हमें दादी की इस कमजोरी का पता था। सो वे खूब सारा खाना रख देती थी। वो अपन को दिनभर के लिए हो जाता था। लेकिन मामला छुट्टी पर उलझता था। सो अपन को पता चला कि जब कोर्स पूरा नहीं होता है। और परिक्षाएं समय पर होनी हो। तो शिक्षक एक्सट्राक्लास लगाकर कोर्स पूरा करते हैं। लिहाजा फिर क्या था। हमारा कोर्स तो पहले से ही पीछे चल रहा था। और इस विषय में तो आप जितनी क्लास पढ़े उतनी ही कम है। जिंदगी भी अजीब चीज है। जिन विषयों की क्लास अटेंड करने आप नहीं जाते है। उनमें तो पास हो जाते है। और जिस जिंदगी की आप एस्कट्राक्लास भी करते हैं। उसमें फेल हो जाते है। मुझे आपका पता नहीं। लेकिन अपन तो फेल ही हो गए। उस साल नहीं। जिंदगी में।
Subscribe to:
Posts (Atom)