Friday, November 12, 2010

क्या आप कभी मिलते हैं। अपने दादा के दोस्तों से।

कैलाश जोशीजी के पास प्रतिक्रिया लेने गए थे। सुदर्शन सोनिया विवाद पर। बात संघ की निकली और उनके लोगों की। उन्होंने बताया कि गोपाल जी व्यास इन दिनों दिल्ली में हैं। वे छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के सदस्य है। करीब 25 साल पहले उन्हें देखा था। फिर वे इधर उधर घूमते रहे। और अपन दिल्ली आ गए। लेकिन दादा के पास उनके पत्र आते रहे। वे अपने हालचाल भी पूछते थे। सो उनका मकान नंबर पूछकर आज मिलने पहुंच गए। पत्रकार की वेशभूषा में देखकर वे समझ गए। कि प्रतिक्रिया चाहिए। मैंने बताया कि में पत्रकार बन कर नहीं आया हूं। सिर्फ आपसे मिलना चाहता हूं। खूब बातें करी। उन्होंने पुरानी बातेँ। सुनाई। 25 साल बाद भी पूछा। कि अभी भी नई नई किताबें पढ़ने की रुची है या छूट गई। मैं चुप रहा।
मैं दिन भर सोचता रहा। अपने दादा के एक पुराने दोस्त से मिलने गया था। या उस रूप से अपने दादा को देखना चाहता था। उस बुजुर्ग आदमी में शायद मैं अपने बब्बा को खोजता रहा। हम अक्सर बुजुर्ग लोगों में अपने दादा को तलाशते रहते हैं। और जो हिस्सा उनसे मिलता है। हम उसे पूजने लगते हैं। लगता है जैसे इस दुनिया के हर बुजुर्ग में एक हिस्सा मेरे दादा का है। उस हिस्से की तलाश में हर बुजुर्ग को खंगालता रहता हूं। मेरे मकान मालिक हर सुबह चार बजे उठकर बैठ जाते हैं। उनकी यही आदत मुझे मेरे दादा से मिलाती है। और उनके प्रति एक अपनापन लगता है। पिछले दिनों बस में एक बुजुर्ग महिला से मुलाकात हुई। अपन शान से बैठे थे। सफर लंबा था। लेकिन वे बाजू में खड़ी थी। हम खड़े हो गए। और उन्हें बैठा दिया। दो घंटे के सफर में थका नहीं। सिर्फ उन्हें देखता रहा। उस हिस्से को तलाशता रहा। जो उन्हें मेरी दादी के साथ मिलाता हो। पीछे खड़े एक आदमी ने कहा भी आप भले आदमी मालूम होते है। बुजुर्ग की इज्जत करते हैं। मैंने सोचा इसको कैसे बताऊ। यह सीट मैंने अपनी दादी को दी है। इस बुजुर्ग महिला को नहीं।
जब कभी हमारी जिंदगी का एक हिस्सा कट कर हमसे छूट जाता है। उस अधूरे पन को दूर करने के लिए हम कितनी कोशिशें करते हैं। कभी स्वाभाविक तो कभी आर्टीफिशियल ।लेकिन हम कितनी ही खींचतान करें। जो छूट जाता है। वह पूरा नहीं होता। लेकिन मैंने पढ़ा है कि एक लेखक ने लिखा है कि जिन्हें रेगिस्तान में मृगमारीचका नहीं होती। उनकी प्यास में जरूर कुछ कमी रहती है। मेरे दोस्त अक्सर शिकायत करते हैं कि ब्लाग में दादी और दादा से ऊपर उठो। लेकिन न जानें क्यों मैं वापस उन्हीं के पास आ जाता हूं। शायद यह मेरा वो टूटा हुआ हिस्सा है जिसे में अक्सर पूरा करने की कोशिश में लगा रहता हूं। क्या आप भी कभी भागकर जाते हैं। अपने दादा के दोस्तों से मिलने मेरी तरह। कैसे करते हैं जिंदगी के इस टूटे हुए हिस्से को पूरा। हमें लिखिएगा जरूर।

Monday, October 18, 2010

मुफ्त के मजे के सहारे कटती जिंदगी।

अपन साउथ दिल्ली की सबसे खूबसूरत मॉल के सामने रहते है। सिलेक्ट सिटी वॉक। लेकिन महीनों में जा पाते हैं। कभी कभार। पिछले दिनों गए थे। मॉल में घुसते ही एक सुंदर स्मार्ट लड़की ने नमस्कार किया। और बताया कि उसके साथ हमें एक खेल खेलना है। खेल जीते तो कोल्ड ड्रिंक की दो बोतलें मिलेगीं। और हार भी गए तो भी एक बोतल तो साथ रहेगी ही। खेल सीधा साधा था। खेल का नाम था। ऊ....आ। वो ऊ कहेगी तो हाथ आगे ले जाना है। आ कहेगी। तो हाथ पीछे लाना है। और ऐसा करते रहना है। जो आखरी में बचा रहेगा। वो जीत जाएगा। बात खेल की नहीं थी। बात मुफ्त में कोल्ड ड्रिंक की बोतल की थी। मैं न बोलकर आगे चला गया। वो बोली आपका दिलचस्पी क्या खेल में नहीं है। मैंने कहा खेल में है। मुफ्तखोरी में नहीं है। यह खेल नहीं है। लालच का दाना है। मुझे नहीं खाना है।
आगे फिर एक नौजवान मिला। बोला सर इस फार्म को भर दीजिए। मैंने कहा कि मुझे यह सुविधा नहीं चाहिए। वह बोला फिल्म के दो टिकिट मुफ्त में मिलेगें। इसके कुछ कदम बाद फिर किसी ने रोका सर यह कार्ड बनवा लीजिए। आपको फ्री में कॉफी मिलेगी। मैं चुप रहा और सोचने लगा कि हमारी रोज मर्रा की जिंदगी में अब इतना समय और धन नहीं है। कि जिंदगी को घसीटते घसीटते उसमें मजा के लिए भी हासिया हो। लिहाजा इस बाजार ने मुफ्त में मजा का लालच देने का फार्मूला बना लिया है। वह जानता है कि नौकरी पेशा आदमी अगर फिल्म देखता है तो कई बार बजट लिखता और मिटाता है। लेकिन अगर उसे मुफ्त में फिल्म की टिकिट मिल जाए। तो उसे लाटरी लग जाती है। कौन और क्यों यू ही बैठकर कोल्ड ड्रिंक पिए। लेकिन अगर आ और ऊ करने से मुफ्त में मिलती है तो बुराई क्या है।
अब हमारी जिंदगी में मजा करना कठिन और मंहगा होता जा रहा है। लगता है आने वाले दिनों में बाजार यू हीं हमारे लिए कभी कभार कुछ अपनी जूठन के टुकड़े फेकेगा और हम उसे खाकर धन्य होगें। वही हमारे लिए मजा होगा।
अमिताभ बच्चन भले कहते हों। कि उनका खेल लोगों के सपने पूरे करता है। लेकिन शायद उन्हें नहीं पता कि किसी के सपने किसी एक खेल से पूरे नहीं होते। सपने तो मंजिल तय करने और एकाग्रता के साथ की गई मेहनत से पूरे होते है। जुआ जीतने से कोई रास्ता नहीं बनता। बल्कि ऐसी बैशाखी लोगों को आंखों में इस तरह चित्रित होती है। कि लोग अपनी कुदाल और छैनी हथोड़ा भूलकर जुआ के पांसों में उलझ जाते हैं। इस मुफ्त खोरी की प्रवृत्तियों से हम अपने आप को कैसे बचा पाएगें। पता नहीं। आप क्या सोचते हैं। हमें लिखिएगा जरूर।

Sunday, October 17, 2010

अंदर का रावण मरे। तो अपन भी राम बनें।

विजया दशमीं को अपन दिल्ली में ही थे। घर नहीं गए। हालांकि घर से कई फोन आए। हमारे बुंदेलखंड में दुर्गा अष्टमी को कुल देवी की पूजा होती है। उसका महत्व दीपावली और होली से भी ज्यादा होता है। फिर भी अपन नहीं जा पाए। दादी को समझा दिया। हालांकि मध्यप्रदेश और दिल्ली की विजया दशमीं में काफी अंतर हैं। अपने घर पर परमा को देवी रखी जाती हैं। और फिर दसवें दिन उनका विसर्जन होता है। वैसा ही जैसे महाराष्ट्र में गणपति का होता है। सो दशहरे के दिन पूरी रात काली विसर्जन होता है। अखाड़े ढोल ढमाके और आतिशबाजी खूब होती है। दिल्ली में यह चलन नहीं है। यहां रावण को जलाना ज्यादा बड़ा त्योहार होता है।
बचपन में दादी से रामायण और महाभारत की कथाएं खूब सुनी है। जो कहानियां दादी रामायण और महाभारत की सुनाती है। उनमें से कई बातें पढ़ने पर नहीं मिलती है। वे बाते उन तक कैसे पहुंची। पता नहीं। लेकिन जो छोटी छोटी बातें बे अक्सर समझाती थी। उनमें खूब मजा आता था। दादी कहती है। कि रावण का अंहकार, कुंभकरण की नींद, और दूसरी तामसी प्रवृत्तियां जब तक हमारे अंदर है। तब तक हम भी रावण ही है। रावण और राम में विचार का अँतर है। अगर हमारे अंदर राम की मर्यादा है तो हम राम हैं। और अगर रावण का अंहकार है तो हम रावण है। लिहाजा यह हमारे ऊपर है। कि हमें क्या बनना है। राम और रावण दो अलग अलग नहीं है। हमारे भीतर एक साथ है।
इस बात को मैं जितना समझता जाता हूं। उतना अपने आप से डरने लगता हूं। अब हमें ऐसा लगता है। कि हमारी सोच और प्रवृत्तियों में राम कम और रावण ज्यादा हावी रहता है। हम ज्ञान में भले रावण से कम हों। लेकिन अंहकार को अगर किसी मशीन से नापा जाए। तो शायद हम आज रावण से ज्यादा अंहकारी है। कुंभकरण से ज्यादा तामसी और मेघनाथ से ज्यादा राक्षस।
मोहल्ले के बच्चे सुबह सुबह ही चंदा कर रहे थे। कहने लगे भाई साहब कुछ पैसे दीजिए। मैंने पूछा। तो उन्होंने बताया कि रावण जलाना है। मैंने पूछा क्यों। किसी ने सिखा दिया था। या वे ही मौलिक थे। पता नहीं। बोले रावण बुराई का प्रतीक है। उसे जलाना है। मैंने कहा रावण की बुराई तो जला दोगे। और अपनी का क्या करोगे। वे चुप हो गए। मुझे अपनी गलती समझ में आई। मेरा यह प्रश्न उन बच्चों से नहीं अपने आप से था। मैं चुपचाप एक नोट देकर घर आ गया। और मैं सोचता रहा। कि रावण को हम हर साल जलाते है। लेकिन जो अपने अंदर रावण पनप रहा है। फल फूल रहा है। उसका का क्या करें। और अंदर का राम तो दुबला और कमजोर होता जा रहा है। मुझे पता नहीं मेरे अंदर का रावण कैसे और कब मरेगा। यह मरे तो हम भी राम बने। आपको कोई उपाए पता हो तो बताइगा जरूर।

Wednesday, September 29, 2010

न जाने कौन सी मुलाकात आखरी हो।

अभी कुछ देर पहले सागर से आशीष ज्योतिषी का एसएमएस आया। आशुतोष तिवारी की मां शांत हो गई। कुछ दिन पहले ही इसी तरह का एसएमएस आशीष द्दिवेदी का सागर से आया था। दीपक दुबे के पिताजी का देहांत हो गया। इन दोनों घटनाओँ में एक समानता थी। मैं कुछ दिन पहले ही इनसे मिलकर आया था। रक्षाबंधन पर सागर गया था। आशुतोष के घर गया।मां से मिला। वे हमेशा से ही मूंगफली की बर्फी बनाती और हम लोगों को खिलाती थी। मुझे बेहद पसंद थी। आशुतोष के घर जाने का यह लालच हमेशा से था। मैं इस बार भी गया। वे बीमार थी। पहचान गई। और बात मूंगफली की बर्फी की भी हुई। उन्होंने वायदा किया कि अगले बार आओगे। तो जरूर खिलाउंगी। बे बीमार थी। शायद हमें बहला रही थीं। जैसे कोई मां बच्चों को बहलाती हो जब वे चांद के जिद करते हैं। लेकिन वे अपना वायदा इतनी जल्दी तोड़ देगी। मुझे यकीन नहीं आ रहा।
दीपक दुबे की साथी प्रकाशन। सागर के कटरा बाजार में है। यानि दिल्ली के कनाट प्लेस में। हम लोग बचपन से ही साथी प्रकाशन जाते। दीपक दुबे से किताबे उधार लेते। और किश्त किश्त पैसे चुकाते। दीपक की दुकान के आस पास समोसे से लेकर चाय पान तक तमाम चीजें आसानी से मुहैया हो जाती है। सो अपने मजे थे। इस बार भी सागर गए। दीपक के साथ समोसे खाए। चाय पान भी किया। उनके पिताजी से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि रात को आए हो। किसी दिन जल्दी आना। बात करना है तुमसे। और फिर हम जल्दी न जा पाए। और दिल्ली लौट आए। फिर उनके जाने की खबर आ गई।
आप न दीपक दुबे को जानते है। और न आशुतोष तिवारी को। न उनके माता पिता को। फिर भी ये ब्लाग में क्यों लिख रहा हूं। इन घटनाओं को महशूस करने के बाद। एक अलग तरह का डर बैठ गया है। ये बात अचानक मेरे मन में डर की तरह बैठ गई। हमें ये जिंदगी में पता ही नहीं होता कि किस व्यक्ति से आखरी मुलाकात हो रही है। या फिर कौन सी मुलाकात अंतिम हो। हम अपनी बेतुकी जिंदगी में इतने व्यस्त होते जा रहे है। कि हम हर समय जल्दी में हैं। जल्दी किस बात की है। पता नहीं। जाना कहां हैं पता नहीं है। लेकिन एक रफ्तार है। बस उसके हिसाब से भागते जा रहे है। अब तो लगता है दूसरों की बात अलग है। हमारी अपनी ही अपने आप से मुलाकात कब हुई थी। पता नहीं। अब वक्त मिले तो विस्तार से अपने से मिलूंगा। और कुछ याद करूगां। अपनी बाते भी। आप की आखरी मुलाकात अपने आप से कब हई थी बताईएगा।

Wednesday, September 22, 2010

न अपने घर विराजे गणपति न विसर्जन हुआ।

अपन दादी से अभी भी झूठ बोलते रहते है। कई साल का अनुभव जो है। उनसे झूठ बोलने का। पता नहीं वे भी समझती है या नहीं। गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले ही उन्होंने सब कुछ बता दिया था। कल गणेश चतुर्थी है। गणपति बब्बा को घर में बिठा लेना। पूजा करना और उनसे सद-बुद्धि मांगना। हर बार की तरह इस बार भी हमने कहा जैसा आप कहती जाती है। वैसा ही हम करते जाते हैं। आज भी उन्होंने कहा कि जाकर किसी मंदिर में गणपति रख आना। नदी पर मत जाना। पैर छूकर विसर्जन कर देना। उनसे सबके लिए कल्याण और अच्छा स्वास्थ्य मांगना। मैंने कहा जी। अभी घर पहुंचा तो फोन करके बता दिया। सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा आपने कहा था। दोनों समय आरती की। लड्डू का प्रसाद चढ़ाया। खूब पूजा पाठ उनकी सेवा की। और प्रार्थना हर रोज की। सद-बुद्धि के लिए।
सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठी अपनी बुजुर्ग दादी को मैं क्यों दुखी करूं। सच बोलकर। सो झूठ बोलना अच्छा लगा। सुबह से रात कब हो जाती है। खबर खोजते और बनाते बनाते पता ही नहीं चलता। ऐसे में ये कहां मुमकिन था। बाजार जाकर गणपति बब्बा की मूर्ति खोजना। उसे घर लाकर बैठाना। उनकी पूजा समय से करना। हर रोज आरती करना। और फिर पूरे नियम कायदे से उनका विसर्जन करना। हमारी जिंदगी से हर वो चीज दूर होती जा रही है। जिसे हम टाल सकते है। टालने को तो हम फ्यूज ट्यूबलाइट बदलना भी कई दिन तक टालते रहते है। सो गणपति बब्बा भी इस साल टाल ही दिए।
शायद आपको भी याद होगा। जब हम और आप बच्चे थे। गणपति को घर में बिठालना। उनकी झांकी बनाना। फिर प्रसाद का इंतजाम। और दूसरे कार्यक्रम। कितना मजा देते थे। लेकिन धीरे धीरे हम जिंदगी और फिर परिवार और अब नौकरी में ऐसे फंस गए कि सब तीज त्योहार भूल ही गए। अब तो सिर्फ खबरों से पता चलता है कि आज गणपति विसर्जन था। या फिर देवी विसर्जन। मुझे एक बात समझ में नहीं आती। दादी कहती है। कि तुम लोगों की वजह से त्योहार है। और मुझे दिल्ली में लगता है कि त्योहार की रौनक ही बुजुर्ग होते है। उन्हीं ही आखों में त्योहार पलता है। पनपता है। और उन्हीं की झुर्रियों में रुकता है। बरसता है। अगर हम से त्योहार होता तो हम अकेले और उदास न होते ।मेरे त्योहार तो दादी की कहीं किसी झुर्री में रुके हुए हैं। सागर जाउंगा तभी उनके साथ मनाउँगा। उन्हीं के साथ बैठकर गणपति से सद-बुद्धि मांगूगां। आज तो अपन ने झूठ बोल दिया। वे शायद चैन से सो भी गई होगीं। आपने क्या किया अपने गणपति का हमें बताइएगा जरूर।

Monday, August 9, 2010

त्यौहारों की रौनक। परदेश में उदास करती हैं।

मैं जब भी अपने घर का पता बताता हूं। पूछता हूं। आपने सिलेक्ट सिटी मॉल देखा। दिल्ली का सबसे सुंदर मॉल है। बस उसी के ठीक सामने रहता हूं। घूमने लायक जगह है जरूर देखना चाहिए। कभी आईए ना। मैं किसी को भी पता बताते वक्त अपनी पत्नी के चेहरे की तरफ नहीं देखता हूं। मुझे पता है। वह मेरी तरफ कैसे देख रही होगी। बात आप शायद समझ गए होगें। कि मॉल हमारे घर के ठीक सामने हैं। लेकिन जिसका इस्तेमाल अधिकतर अपने घर का पता बताने के लिए ही करता हूं। उसमें घूमने नहीं जा पाता। जब घर से निकलता हूं। तो मॉल बंद रहता है। जब घऱ आता हूं। तो मॉल बंद हो जाता है। संडे की अपनी हिम्मत घर से निकले की ही नहीं होती। लिहाजा मॉल दूर से ही देखता हूं। खरीददारी करना तो अपनी कूबत के बाहर है। लेकिन पिछले दिनों संडे की पूरी छुट्टी थी बिना किसी तनाव के। सो अपन पत्नी के सात मॉल घूमने चले गए। वहां जाकर पता चला कि रक्षाबंधन करीब ही है। और यह भी याद आ गया कि लोकसभा का सत्र चल रहा है। सो छुट्टी मिले या न मिले। मांगने में ही शर्म लगेगी।
मॉल में तरह तरह की राखी देखीं। राखी के साथ विज्ञापन भी। अब तो हमारे त्यौहार बाजार ने खरीद लिए है। उसने इन त्यौहारों पर इस तरह से कब्जा कर लिया है कि लगता ही नहीं कि कभी ये त्यौहार अपने घर के थे। लगता है हमेशा से ही इन मुनाफखोरों के थे। हर जगह विज्ञापन थे। विज्ञापन वो भी ऐसे की आपको अपनी क्षमताओं पर ही शर्म लगे। हजारों रुपए के जेवर। उन पर लिखा था। इनकी मदद से आप अपनी बहिन को बता सकते हैं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं। बड़ी बड़ी कपड़ों की दुकानें। चमकती उपहारों की दुकानें। राखी दब गई कहीं। त्यौहार बुझ जाता है कहीं। सिर्फ कारोबारियों के उपहार देने की नसीहत उभर के बार बार सामने आती है।
बात उस चकम धमक की नहीं थी। बात उस बाजार की भी नहीं है। जिसके अपन सिर्फ दर्शक हैं। खऱीददार नहीं। बात उस रौनक की है। जो हमारे भीतर त्यौहारों को जन्म देती है। बात उस सूचना की भी है। जो हमें कई बार बाजार देता है। रक्षाबंधन की दुकानें देखकर मुझे अपना घर और संगे संबंधी याद आने लगे। सावन को बुदेंलखंडी में हम साहुन कहते हैं। सो साहुन का महीने लगते ही राखी की तैयारियां शुरू हो जाती है। किस तरह के कपड़े खरीदें जाएगें। बहिन को क्या दीया जाएगा। बहिन किस तरह की राखी खरीद कर लाएगी। हमारे इलाके में एक विशेष प्रकार का पकवान बनता है। जिसे हम फैनी कहते है। गोल गोल जलेबी की तरह। लेकिन फैनी पर शक्कर अलग से चड़ती है। जिसे दादी हफ्तें भर पहले से ही पागने में लग जाती थी। और त्यौहारों की रौनक पूरे शरीर में चमकती थी।
लेकिन इस बार मॉल की राखियां देखकर मन कुछ उदास सा हुआ। न घर जाने की सुविधा। न त्यौहारों में पहले जैसा रस। अब दादी भी बूड़ी हो चली है। सो अब वे पकवान और मिठाइयां उतने उत्साह से नहीं बना पाती है। लेकिन घर के लोग बताते हैं। जिन त्योहारों पर हम सागर जाते हैं। उन त्योहारों पर वे अभी भी पहले की ही तरह जुटी रहती है।
यह बात सच है कि त्यौहारों की रौनक अपनो से जन्म लेती है। और वहीं पनपती है। दिल्ली में नया साल या फिर वेलेंटाइन डे देखने और मनाने मे मजा तो आ सकता है। लेकिन साहुन या फिर दिवाली का मजा घर में ही आता है। और त्यौहारों के लिए सजे ये बाजार हमें घर की याद दिलाते हैं। उदास करते है। इनकी रौनक हमारे अंदर उत्साह नहीं उदासी भरती है। आप ही बताओं क्या करें। इन बाजारों का। इन उदास त्यौहारों का। या फिर इस अकेलेपन का। आप कैसे लड़ते हैं इन सबसे हमें भी बताइएगा। जरूर।

Sunday, August 8, 2010

न पैर में खुजली होती है। और अब न ही कोई याद करता है।

शायद आपको याद होगा। जब कभी बचपन में हमारे पैर के तलवे में खुजली होती थी। तो दादी कहती थी। कोई याद कर रहा होगा। आज अचानक कई सालों बाद मेरे पैर में अचानक खुजली हुई। और मैं सोचने लगा कि शायद कोई याद कर रहा होगा। लेकिन इतने सालों बाद। बात कुछ अजीब सी है। लेकिन इन विश्वासों का जमघट जिंदगी में लंबे समय तक रहा है। हमारे बुंदेलखंड में अगर आपको हिचकी आने लगे। तो बाजू में बैठा कोई भी आदमी कह देगा। आपको कोई याद कर रहा है। लेकिन अब हमारी जिंदगी में न हिचकी आती है। और न ही पैर के तलवे में खुजली होती है।
बात इतनी सी नहीं है कि इन बातों का न कोई वैज्ञानिक आधार है। न सांस्कृतिक और न हीं दार्शनिक। ये हम भी जानते हैं। लेकिन फिर भी मन को हर खुजली के बाद हर हिचकी के बाद अच्छा लगता था। इस दुनिया में कहीं कोई है जो हमें याद करता है। लेकिन अब इस भागती और अकेली होती दुनिया में हमें कोई याद ही नहीं करता। हम सब अपनी दुनिया में अकेले होते चलते हैं। दिल्ली में ऐसा कभी होता ही नहीं। कि आपके दरवाजे की घंटी बजे और कोई आपका चाहने वाला दरवाजे पर खड़ा हो। कहता हो तुम्हारी याद आ रही थी। मिलने चला आया। यहां पर सिर्फ धोबी। कचरा उठाने वाले। पेपर या केबिल का बिल लेना वाला ही घंटा बजाता है। या कभी कभार गुस्से में पड़ोसी आता है।गाड़ी ठीक से खड़ा किया करो। मुझे अपनी गाड़ी निकालनी है। बुदबुदाकर चला जाता है।
लेकिन अपन जिन छोटे शहरो से आए है। वहां अक्सर ऐसा होता है। कि कोई भी आपको दरवाजे पर मिल जाएगा। उसे आपसे मिलने की इच्छा हुई । और वह चला आया। गप की। और चला गया। हमारे छोटे शहरों में लोगों के पास एक दूसरे के लिए समय है। उनके लिए स्थान भी है। लेकिन दिल्ली में तो अपने लिए ही आपको वक्त कम पड़ता है। परिवार मे हर रोज चिकचिक होती है। ऐसे में आप किसको याद करेगें। मुश्किल है न। चलिए फिर भी आज अच्छा लगा कि शायद दादी की बात सही हो। और किसी ने मुझे याद किया हो। कभी कभार आप भी मुझे याद कर लिया करिए। बहुत दिन हुए हिचकी नहीं आई।