Thursday, May 6, 2010
जीजाजी वक्त के साथ जीजा हुए फिर जीजू और अब जीज
मेरी एक रिपोर्टर का फोन आया। मुझे छुट्टी चाहिए। मेरे जीज आए हैं। पहले तो मैने जीज को खीज सुना। मैने सुधारा। खीज आए नहीं। आई है। उसने दोहराया। खीज नहीं जीज। मैंने सारे रिश्ते याद कर लिए। लेकिन जीज को नहीं समझ पाया। यह शब्द और ये रिश्ता हमसे नहीं सुलझा। मैंने कहा। मैं समझा नहीं। उसने फिर बताया दीद आई हैं। साथ मैं जीज भी हैं। अब मैं समझा जैसे मम्मी वक्त के साथ ममा हुई और फिर मॉम। पिताजी, पापा हुए फिर डेडी और अब डेड। मेरे एक मित्र कहते भी है। जिसकी मॉम जितनी जीवंत होगीं। डेड उतने ही डेड होगें। हालांकि उनका ये दर्शन कुछ लोगों को गुस्सा भी दिलाता है।संबोधन का सिर्फ इतना ही मकसद होता है। जिसे आप बुलाए वो सुन ले। ऐसा मैं सोचता था। लेकिन उम्र के साथ साथ मुझे लगने लगा है कि शब्द भी जीवंत होते हैं। इनमें भी जीवन है। इनको इस्तेमाल करने वाला अपना जीवन डालता हैं इनमें। और वह इन्हें आयुवान भी बनाता है। सयुक्त परिवारों में जैसा होता है। वैंसा चलन अपने यहां भी रहा। मैं आज भी अपने पिता को भैया। मां को भाभी कहता हूं। मेरी पत्नी अपने पिता को चाचा और मां को चाची कहती हैं। इसके चलते मैंने अपने जीवन में बहुत कम महिलाओं को भाभी कहा। और जिसको भाभी कहा। उसके साथ न कभी मजाक की। न कभी उनके साथ होली खेली। उन्हें मां की तरह ही माना। पिता भी कहते हैं। कि उन्हें कभी पिता का आभास ही नहीं हुआ। वे अपने बच्चों के बड़े भैया ही बने रहे।आधुनिकता हमारे संबंधों के कद को छोटा करती जा रही है। इसका हमें आभास होता रहता है। संबोधन भी विकृत होते जा रहे हैं। इनका असर भी समाज पर दिखने लगा है। मुझे याद है कि दिल्ली की रहने वाली एक युवती हमारे बुंदेलखंड में कलेक्टर की ट्रैंनिंग करने गई थी। वे रात को दुकाने बंद कराने पहुंची। तो एक सज्जन व्यक्ति ने कह दिया कि दीदी बंद करता हुं। वे तपाक से बोली मेरे पिता तो यहां कभी आए नहीं। फिर में तुम्हारी दीदी कैसे हुई। जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तो मैंने उन्हें बताया था। कि परदेशी को दीदी कहना अपनी मां की चरित्रहीनता का परिचय देना नहीं है। अपरिचित लड़की को भी बहिन का दर्जा देना हमारी बुंदेली संस्कृति हैं। इन्हीं मौहतरमा ने बाद के दिनों में एक शिक्षक को चांटा भी मारा था। और अपने सांसकृतिक मूल्यों का खुद ही परिचय दे दिया था।बात इतनी सी नहीं है कि हम भी पिता को डेड या मां को मॉम कह सकते हैं। जीजा को जीज कहने में हर्ज नहीं है। लेकिन हम उस संस्कृति में पल कर आए हैं। जहां पर राम का नाम लिखने से पत्थर भी तैरने लगते है। लिहाजा हर शब्द का अर्थ होता है। और अर्थ से सांस चलती है। जीवन बनता है। लेकिन हमने यह भी जाना है कि मरा कहते कहते भी लोग राम कहने लगते हैं। बात शब्दों की नहीं बात संबंधो की है। हम कुछ भी कहे। कुछ भी सुने। लेकिन जब तक संबंध मीठे हैं। मजा तब तक ही है। हो सकता है आप लोग भी अपने माता पिता को अलग अलग नाम से बुलाते होगे। हमें लिखिएगा जरूर। बताइगा आपने अपने रिश्तों को क्या क्या नाम दिए हैं। हमें इतंजार रहेगा।
जीजाजी वक्त के साथ जीजा हुए फिर जीजू और अब जीज
मेरी एक रिपोर्टर का फोन आया। मुझे छुट्टी चाहिए। मेरे जीज आए हैं। पहले तो मैने जीज को खीज सुना। मैने सुधारा। खीज आए नहीं। आई है। उसने दोहराया। खीज नहीं जीज। मैंने सारे रिश्ते याद कर लिए। लेकिन जीज को नहीं समझ पाया। यह शब्द और ये रिश्ता हमसे नहीं सुलझा। मैंने कहा। मैं समझा नहीं। उसने फिर बताया दीद आई हैं। साथ मैं जीज भी हैं। अब मैं समझा जैसे मम्मी वक्त के साथ ममा हुई और फिर मॉम। पिताजी, पापा हुए फिर डेडी और अब डेड। मेरे एक मित्र कहते भी है। जिसकी मॉम जितनी जीवंत होगीं। डेड उतने ही डेड होगें। हालांकि उनका ये दर्शन कुछ लोगों को गुस्सा भी दिलाता है।
संबोधन का सिर्फ इतना ही मकसद होता है। जिसे आप बुलाए वो सुन ले। ऐसा मैं सोचता था। लेकिन उम्र के साथ साथ मुझे लगने लगा है कि शब्द भी जीवंत होते हैं। इनमें भी जीवन है। इनको इस्तेमाल करने वाला अपना जीवन डालता हैं इनमें। और वह इन्हें आयुवान भी बनाता है। सयुक्त परिवारों में जैसा होता है। वैंसा चलन अपने यहां भी रहा। मैं आज भी अपने पिता को भैया। मां को भाभी कहता हूं। मेरी पत्नी अपने पिता को चाचा और मां को चाची कहती हैं। इसके चलते मैंने अपने जीवन में बहुत कम महिलाओं को भाभी कहा। और जिसको भाभी कहा। उसके साथ न कभी मजाक की। न कभी उनके साथ होली खेली। उन्हें मां की तरह ही माना। पिता भी कहते हैं। कि उन्हें कभी पिता का आभास ही नहीं हुआ। वे अपने बच्चों के बड़े भैया ही बने रहे।
आधुनिकता हमारे संबंधों के कद को छोटा करती जा रही है। इसका हमें आभास होता रहता है। संबोधन भी विकृत होते जा रहे हैं। इनका असर भी समाज पर दिखने लगा है। मुझे याद है कि दिल्ली की रहने वाली एक युवती हमारे बुंदेलखंड में कलेक्टर की ट्रैंनिंग करने गई थी। वे रात को दुकाने बंद कराने पहुंची। तो एक सज्जन व्यक्ति ने कह दिया कि दीदी बंद करता हुं। वे तपाक से बोली मेरे पिता तो यहां कभी आए नहीं। फिर में तुम्हारी दीदी कैसे हुई। जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तो मैंने उन्हें बताया था। कि परदेशी को दीदी कहना अपनी मां की चरित्रहीनता का परिचय देना नहीं है। अपरिचित लड़की को भी बहिन का दर्जा देना हमारी बुंदेली संस्कृति हैं। इन्हीं मौहतरमा ने बाद के दिनों में एक शिक्षक को चांटा भी मारा था। और अपने सांसकृतिक मूल्यों का खुद ही परिचय दे दिया था।
बात इतनी सी नहीं है कि हम भी पिता को डेड या मां को मॉम कह सकते हैं। जीजा को जीज कहने में हर्ज नहीं है। लेकिन हम उस संस्कृति में पल कर आए हैं। जहां पर राम का नाम लिखने से पत्थर भी तैरने लगते है। लिहाजा हर शब्द का अर्थ होता है। और अर्थ से सांस चलती है। जीवन बनता है। लेकिन हमने यह भी जाना है कि मरा कहते कहते भी लोग राम कहने लगते हैं। बात शब्दों की नहीं बात संबंधो की है। हम कुछ भी कहे। कुछ भी सुने। लेकिन जब तक संबंध मीठे हैं। मजा तब तक ही है। हो सकता है आप लोग भी अपने माता पिता को अलग अलग नाम से बुलाते होगे। हमें लिखिएगा जरूर। बताइगा आपने अपने रिश्तों को क्या क्या नाम दिए हैं। हमें इतंजार रहेगा।
संबोधन का सिर्फ इतना ही मकसद होता है। जिसे आप बुलाए वो सुन ले। ऐसा मैं सोचता था। लेकिन उम्र के साथ साथ मुझे लगने लगा है कि शब्द भी जीवंत होते हैं। इनमें भी जीवन है। इनको इस्तेमाल करने वाला अपना जीवन डालता हैं इनमें। और वह इन्हें आयुवान भी बनाता है। सयुक्त परिवारों में जैसा होता है। वैंसा चलन अपने यहां भी रहा। मैं आज भी अपने पिता को भैया। मां को भाभी कहता हूं। मेरी पत्नी अपने पिता को चाचा और मां को चाची कहती हैं। इसके चलते मैंने अपने जीवन में बहुत कम महिलाओं को भाभी कहा। और जिसको भाभी कहा। उसके साथ न कभी मजाक की। न कभी उनके साथ होली खेली। उन्हें मां की तरह ही माना। पिता भी कहते हैं। कि उन्हें कभी पिता का आभास ही नहीं हुआ। वे अपने बच्चों के बड़े भैया ही बने रहे।
आधुनिकता हमारे संबंधों के कद को छोटा करती जा रही है। इसका हमें आभास होता रहता है। संबोधन भी विकृत होते जा रहे हैं। इनका असर भी समाज पर दिखने लगा है। मुझे याद है कि दिल्ली की रहने वाली एक युवती हमारे बुंदेलखंड में कलेक्टर की ट्रैंनिंग करने गई थी। वे रात को दुकाने बंद कराने पहुंची। तो एक सज्जन व्यक्ति ने कह दिया कि दीदी बंद करता हुं। वे तपाक से बोली मेरे पिता तो यहां कभी आए नहीं। फिर में तुम्हारी दीदी कैसे हुई। जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तो मैंने उन्हें बताया था। कि परदेशी को दीदी कहना अपनी मां की चरित्रहीनता का परिचय देना नहीं है। अपरिचित लड़की को भी बहिन का दर्जा देना हमारी बुंदेली संस्कृति हैं। इन्हीं मौहतरमा ने बाद के दिनों में एक शिक्षक को चांटा भी मारा था। और अपने सांसकृतिक मूल्यों का खुद ही परिचय दे दिया था।
बात इतनी सी नहीं है कि हम भी पिता को डेड या मां को मॉम कह सकते हैं। जीजा को जीज कहने में हर्ज नहीं है। लेकिन हम उस संस्कृति में पल कर आए हैं। जहां पर राम का नाम लिखने से पत्थर भी तैरने लगते है। लिहाजा हर शब्द का अर्थ होता है। और अर्थ से सांस चलती है। जीवन बनता है। लेकिन हमने यह भी जाना है कि मरा कहते कहते भी लोग राम कहने लगते हैं। बात शब्दों की नहीं बात संबंधो की है। हम कुछ भी कहे। कुछ भी सुने। लेकिन जब तक संबंध मीठे हैं। मजा तब तक ही है। हो सकता है आप लोग भी अपने माता पिता को अलग अलग नाम से बुलाते होगे। हमें लिखिएगा जरूर। बताइगा आपने अपने रिश्तों को क्या क्या नाम दिए हैं। हमें इतंजार रहेगा।
Wednesday, May 5, 2010
अंकल को पोएम सुनाओ। अच्छा अब एबीसीडी सुनाओ
दोस्त की महीनों से शिकायत थी। तुम पत्नी को लेकर घर आओ। दिल्ली में 40 किलोमीटर जाना और फिर वापस आना। वो भी दस साल पुरानी मोटरासाइकिल पर। और हम जैसे आलसी को। मुश्किल था। फिर भी हम पहुंच ही गए। लेकिन मुझे पता नहीं था। कि वे अभी कुछ दिन पहले ही अपने तीसरे बच्चे के एडमीशन की जंग जीतकर आए है। और घर में विजय उत्सव है। मैंने सुना है जीते कोई भी और हारे कोई भी। नुक्सान जंग से सभी को होता है। लेकिन मुझे ये पता नहीं था कि विजय उत्सव में शामिल होने वालों को भी एक जंग लड़नी ही पड़ती है।
शुरूआत ही ऐसी हुई। मेरे दोस्त अपने बेटे को गोदी में लेकर ही मुझे लेने आए। और उन्होंने परिचय भी ऐसा ही कराया। कि अँकल तुम्हारी पोयम सुनने दिल्ली से आए है। अगर अच्छे से सुनाओगे तो टीवी में दिखाएंगे। बताओं कौन सी वाली सुनाओगे। पिता-पुत्र के इस साक्षात्कार को मैने बीच में ही रोका। मुझे जोर से प्यास लगी है। मेरी पत्नी को मुझ से भी ज्यादा। थोड़ा जोर से कहा। शायद कभी कभी जीवन ही पूरा एक विचार का रूप ले लेता है। और हम सिर्फ उसके हिस्से रहते है। वे फिर बच्चे से मुखातिब हुए चलो अंकल को पानी लाए। वो पानी वाली पोएम याद है न। मछली जल की रानी है। बोलो बोलो आगे क्या है। बच्चा शर्माने लगा। मैने कोई खतरा मोल नहीं लिया। और कहा कि इस समय हमारा जीवन पानी है। उन्होंने अपने बच्चे से अंग्रेजी की पोएम सुनवाई। हम सुनते रहे। फिर हिंदी की कविताओं का नंबर आया। चंदा मामा से मछली तक सभी को हमने सुन। फिर एबीसीडी। फिर नोज से हेंड तक पूरे शरीर के हिस्से। और गुड नाइट तक हम नर्सरी का टेस्ट देते रहे। हां इस बीच पानी, चाय नास्ता और खाना भी हमने खाया।
जब बच्चा अपनी मासूमियत खुद लेकर चलता है। तो मजा देती है। लेकिन मासूमियम के नाम पर जब मम्मी उसे कुछ पहना कर भेजती है। तो वह विकृत हो जाती है। मुझे शुरू से ही बच्चों से प्रेम है। और मुझे लगता रहा है कि गांधी और अलबर्ट आइंसटाइन के अलावा मुझे कभी भी च्वाइस हो तो मैं बातचीत के लिए हमेशा बच्चा ही चुनूगां। उनकी मासूम बाते तुम्हारें तनाव को पानी की तरह धो देती है। लेकिन इन्हीं बच्चों के चेहरे पर जब कृत्रिमता पोत दी जाती है। तो मुझे और भी तनाव देती है। मेरे घर के सामने एक शर्मा जी रहते हैं। उनके बच्चे गाली तो बकते हैं। लेकिन संबोधन में आप कहते हैं। लिहाजा न गाली की सुंदरता बचती है। न संबोधन की। संयुक्त परिवारों में बच्चों को ट्रिम करने की फुर्सत मां बाप को नहीं होती। लिहाजा हमारी ग्रोथ टेड़ी मेडी ही रही। इस बात को हम कहते भी रहे हैं। कि हम इतनी जगह से टेड़े है। कि हम न तो फर्नीचर के काम के हैं और न हम मंहगे बिक सकते हैं। लेकिन मौलिक है।
हो सकता है आप भी मेरी तरह ऐसे अनुभवों से गुजरते होगे। इसी तरह हमने अपने एक मित्र को खाना खाने बुलाया था। वे अपने साथ एक सुटकेस नुमा सामान भी लेकर आए। हमने सोचा शादी इनकी हुई है। तोहफा तो हमें देना है। लेकिन इनका लाना तो ठीक नहीं था। कुछ मिनिट बाद ही पता चला कि वह बाकायदा सुटकेस ही है। और उनमें उनकी शादी के एलबम हैं। मैं आपसे झूठ नहीं बोलूगां। लेकिन पूरे दो घंटे हमने उनके सारे रिश्तेदारों की तस्वीरें देखीं। और सबकी विशेषताएं भी सुनी। आपको यकीन नहीं होगा। हमने खाने के बाद फिर उनकी हनीमून की तस्वीरें भी देखीं। कुछ वाक्या भी सुने। बात हमारी बोरियत की नहीं है। बात जिंदगी के उस क्षण की भी हैं। जिसे आप अपने सुकून के लिए अपने साथ रखना चाहते है। आपकी पत्नी हिमांचल के जेवर पहनकर और हिंमाचली पोशाक पहनकर आपको सुंदर लग सकती है। लेकिन हर को लगे। इसका आग्रह क्यों होना चाहिए। मेरी बुआ और मेरे फूफा के आशीर्वाद देती हुई फोटो हमारे लिए कीमती है। लेकिन हमारे घर आए दोस्तों को भी कीमती हो ये जरूरी नहीं। फिलहाल मैने सोच लिया है कि जब तक एडमीशन का समय पूरा नहीं हो जाता। मैं अब किसी के घर नहीं जाउँगा। आपके घर भी नहीं।
शुरूआत ही ऐसी हुई। मेरे दोस्त अपने बेटे को गोदी में लेकर ही मुझे लेने आए। और उन्होंने परिचय भी ऐसा ही कराया। कि अँकल तुम्हारी पोयम सुनने दिल्ली से आए है। अगर अच्छे से सुनाओगे तो टीवी में दिखाएंगे। बताओं कौन सी वाली सुनाओगे। पिता-पुत्र के इस साक्षात्कार को मैने बीच में ही रोका। मुझे जोर से प्यास लगी है। मेरी पत्नी को मुझ से भी ज्यादा। थोड़ा जोर से कहा। शायद कभी कभी जीवन ही पूरा एक विचार का रूप ले लेता है। और हम सिर्फ उसके हिस्से रहते है। वे फिर बच्चे से मुखातिब हुए चलो अंकल को पानी लाए। वो पानी वाली पोएम याद है न। मछली जल की रानी है। बोलो बोलो आगे क्या है। बच्चा शर्माने लगा। मैने कोई खतरा मोल नहीं लिया। और कहा कि इस समय हमारा जीवन पानी है। उन्होंने अपने बच्चे से अंग्रेजी की पोएम सुनवाई। हम सुनते रहे। फिर हिंदी की कविताओं का नंबर आया। चंदा मामा से मछली तक सभी को हमने सुन। फिर एबीसीडी। फिर नोज से हेंड तक पूरे शरीर के हिस्से। और गुड नाइट तक हम नर्सरी का टेस्ट देते रहे। हां इस बीच पानी, चाय नास्ता और खाना भी हमने खाया।
जब बच्चा अपनी मासूमियत खुद लेकर चलता है। तो मजा देती है। लेकिन मासूमियम के नाम पर जब मम्मी उसे कुछ पहना कर भेजती है। तो वह विकृत हो जाती है। मुझे शुरू से ही बच्चों से प्रेम है। और मुझे लगता रहा है कि गांधी और अलबर्ट आइंसटाइन के अलावा मुझे कभी भी च्वाइस हो तो मैं बातचीत के लिए हमेशा बच्चा ही चुनूगां। उनकी मासूम बाते तुम्हारें तनाव को पानी की तरह धो देती है। लेकिन इन्हीं बच्चों के चेहरे पर जब कृत्रिमता पोत दी जाती है। तो मुझे और भी तनाव देती है। मेरे घर के सामने एक शर्मा जी रहते हैं। उनके बच्चे गाली तो बकते हैं। लेकिन संबोधन में आप कहते हैं। लिहाजा न गाली की सुंदरता बचती है। न संबोधन की। संयुक्त परिवारों में बच्चों को ट्रिम करने की फुर्सत मां बाप को नहीं होती। लिहाजा हमारी ग्रोथ टेड़ी मेडी ही रही। इस बात को हम कहते भी रहे हैं। कि हम इतनी जगह से टेड़े है। कि हम न तो फर्नीचर के काम के हैं और न हम मंहगे बिक सकते हैं। लेकिन मौलिक है।
हो सकता है आप भी मेरी तरह ऐसे अनुभवों से गुजरते होगे। इसी तरह हमने अपने एक मित्र को खाना खाने बुलाया था। वे अपने साथ एक सुटकेस नुमा सामान भी लेकर आए। हमने सोचा शादी इनकी हुई है। तोहफा तो हमें देना है। लेकिन इनका लाना तो ठीक नहीं था। कुछ मिनिट बाद ही पता चला कि वह बाकायदा सुटकेस ही है। और उनमें उनकी शादी के एलबम हैं। मैं आपसे झूठ नहीं बोलूगां। लेकिन पूरे दो घंटे हमने उनके सारे रिश्तेदारों की तस्वीरें देखीं। और सबकी विशेषताएं भी सुनी। आपको यकीन नहीं होगा। हमने खाने के बाद फिर उनकी हनीमून की तस्वीरें भी देखीं। कुछ वाक्या भी सुने। बात हमारी बोरियत की नहीं है। बात जिंदगी के उस क्षण की भी हैं। जिसे आप अपने सुकून के लिए अपने साथ रखना चाहते है। आपकी पत्नी हिमांचल के जेवर पहनकर और हिंमाचली पोशाक पहनकर आपको सुंदर लग सकती है। लेकिन हर को लगे। इसका आग्रह क्यों होना चाहिए। मेरी बुआ और मेरे फूफा के आशीर्वाद देती हुई फोटो हमारे लिए कीमती है। लेकिन हमारे घर आए दोस्तों को भी कीमती हो ये जरूरी नहीं। फिलहाल मैने सोच लिया है कि जब तक एडमीशन का समय पूरा नहीं हो जाता। मैं अब किसी के घर नहीं जाउँगा। आपके घर भी नहीं।
Tuesday, May 4, 2010
मैं जिंदा में ही सेवा करना चाहता हूं। और तुम मरने के बाद
मेरे एक बहुत ही प्रिय दोस्त है। हालांकि ये उनकी उदारता है कि वे मुझे अपना बड़ा भाई मानते हैं। हम लोगों को जो कई चीजें निकट लाती है। उनमें से एक उसका नानी के प्रति अदभुत प्रेम है। उसने एक बात सुनाई कि किस तरह से उसके मामा जो विदेश में आला अफसर हैं। अपनी बीमार मां की सेवा के लिए महीनों से घर पर ही डेरा डाले थे। इतनी लंबी छुट्टी से मामी का परेशान होना स्वाभाविक था । और उन्होंने उनसे वापस आने की बात कही।उसके मामा ने जबाव दिया। उसके मामा का कहना था कि हम मां के जिंदा रहते उसके लिए हाथ जोड़ना चाहते हैं। और तुम मां के मरने के बाद हाथ जोडना चाहोगी। यह बात वह सुनाकर चला गया। लेकिन में अभी तक वहीं अटका हूं।
बचपन में जब भी कभी मंदिर में किसी के नाम के पत्थर लगे देखता था। या किसी पंखे पर किसी का नाम। किसी की स्मृति में प्याऊ चलाते लोग। अपने माता पिता की याद में धर्मशाला बनवाते लोग मेरे अँदर कई प्रश्न पैदा करते रहे हैं। मुझे शुरू से ही ये बात लगती रही है कि ये लोग अपने माता पिता की याद में पुण्य करते हैं। तो फिर अपना नाम साथ में क्यों लिखवाते हैं।कई बार तो ये नाम मातापिता के नाम से भी बड़े अक्षरों में होता है। ये स्मृति इनके बुजुर्गों की है या फिर इनका खुद का विज्ञापन। और जिस आदर सत्कार के साथ लोग अपने माता पिता का नाम लिखवाते है। उस से ही कई शंकाओं का जन्म होता है। जो भी बात कही जाए। वह कमजोर अपने आप हो जाती है। जब भी में इस बात का एलान करता हूं कि में अपने माता पिता का सबसे ज्यादा सम्मान करता हूं। उनका चरण सेवक हूं। यही से उपद्रव पैदा होता है। श्रवणकुमार ने अपने माता पिता की याद में कहीं भी कोई धर्मशाला नहीं बनवाई। मैं जानता हूं। अपने एक डाक्टर दोस्त को। जब उनके पिता मरे। तो बे सबसे कम रोए। बात साफ थी मैंने उनको सालों अपने पिता की सेवा करते हुए देखा है। उन्हें जो भी करना था। वे अपने हिस्से का कर चुके थे। अपने कर्तव्य को लेकर वे संतुष्ठ थे। मेरे दादा के निधन पर मेरे पिता ने कहा था। कि आदमी जहां जहां चूकता हैं। वहीं उसे पश्चाताप होता है। वहीं वह रोता है।
विज्ञापन की दुनिया में हर संप्रेषण की कीमत है। कितने बेहतर ढंग से आप अपनी बात कह सकते है। ये आप पर निर्भर हैं। गांव में आज भी जब रिश्तेदार आते हैं। तो गली के मुहाने से ही रोना शुरू कर देते है। उनके हिस्से में सेवा नहीं थी। अब रोकर ही उन्हें सब जताना है। अपने किसी बुजुर्ग की सेवा हम करते हैं। वह हमारे अपने लिए होती है। और जो दिखावा हम किसी के जाने के बाद करते हैं। वह विज्ञापन समाज के लिए है। और इसकी भी कीमत हम वसूलते रहेंगे। यह निवेश हैं। हमारी भावनाओं का समाज के खाते में। जिसे हम भंजाते रहेंगे। पत्रकार होने के नाते अपनी आर्थिक हालत अच्छी कभी रही नहीं। सो अपन ने दादा की याद में न पत्थर लगवाए। न मंदिरों में पंखा टांग पाए। और न ही कोई प्याऊ खोली। न धर्मशाला बनवाने ही हैसियत है। लेकिन हां। दादा के निधन के बाद दिल्ली में दो चुनाव हुए। लोकसभा और विधानसभा। सभा जानते हैं। चुनाव पत्रकारों के लिए उत्सव से कम नहीं है। लेकिन इन चुनाव में अपन बिके नहीं। कीमतें लगती और बढ़ती रहीं। अपन डिगे नहीं। दादा की याद में अपन ने भी एक बोर्ड लगाया है। कि हम बिकाऊ नहीं है। आप भी आशीर्वाद दीजिए कि ये लगा रहे। और उनके साथ साथ आप भी मुझ पर गर्व करते रहे।
बचपन में जब भी कभी मंदिर में किसी के नाम के पत्थर लगे देखता था। या किसी पंखे पर किसी का नाम। किसी की स्मृति में प्याऊ चलाते लोग। अपने माता पिता की याद में धर्मशाला बनवाते लोग मेरे अँदर कई प्रश्न पैदा करते रहे हैं। मुझे शुरू से ही ये बात लगती रही है कि ये लोग अपने माता पिता की याद में पुण्य करते हैं। तो फिर अपना नाम साथ में क्यों लिखवाते हैं।कई बार तो ये नाम मातापिता के नाम से भी बड़े अक्षरों में होता है। ये स्मृति इनके बुजुर्गों की है या फिर इनका खुद का विज्ञापन। और जिस आदर सत्कार के साथ लोग अपने माता पिता का नाम लिखवाते है। उस से ही कई शंकाओं का जन्म होता है। जो भी बात कही जाए। वह कमजोर अपने आप हो जाती है। जब भी में इस बात का एलान करता हूं कि में अपने माता पिता का सबसे ज्यादा सम्मान करता हूं। उनका चरण सेवक हूं। यही से उपद्रव पैदा होता है। श्रवणकुमार ने अपने माता पिता की याद में कहीं भी कोई धर्मशाला नहीं बनवाई। मैं जानता हूं। अपने एक डाक्टर दोस्त को। जब उनके पिता मरे। तो बे सबसे कम रोए। बात साफ थी मैंने उनको सालों अपने पिता की सेवा करते हुए देखा है। उन्हें जो भी करना था। वे अपने हिस्से का कर चुके थे। अपने कर्तव्य को लेकर वे संतुष्ठ थे। मेरे दादा के निधन पर मेरे पिता ने कहा था। कि आदमी जहां जहां चूकता हैं। वहीं उसे पश्चाताप होता है। वहीं वह रोता है।
विज्ञापन की दुनिया में हर संप्रेषण की कीमत है। कितने बेहतर ढंग से आप अपनी बात कह सकते है। ये आप पर निर्भर हैं। गांव में आज भी जब रिश्तेदार आते हैं। तो गली के मुहाने से ही रोना शुरू कर देते है। उनके हिस्से में सेवा नहीं थी। अब रोकर ही उन्हें सब जताना है। अपने किसी बुजुर्ग की सेवा हम करते हैं। वह हमारे अपने लिए होती है। और जो दिखावा हम किसी के जाने के बाद करते हैं। वह विज्ञापन समाज के लिए है। और इसकी भी कीमत हम वसूलते रहेंगे। यह निवेश हैं। हमारी भावनाओं का समाज के खाते में। जिसे हम भंजाते रहेंगे। पत्रकार होने के नाते अपनी आर्थिक हालत अच्छी कभी रही नहीं। सो अपन ने दादा की याद में न पत्थर लगवाए। न मंदिरों में पंखा टांग पाए। और न ही कोई प्याऊ खोली। न धर्मशाला बनवाने ही हैसियत है। लेकिन हां। दादा के निधन के बाद दिल्ली में दो चुनाव हुए। लोकसभा और विधानसभा। सभा जानते हैं। चुनाव पत्रकारों के लिए उत्सव से कम नहीं है। लेकिन इन चुनाव में अपन बिके नहीं। कीमतें लगती और बढ़ती रहीं। अपन डिगे नहीं। दादा की याद में अपन ने भी एक बोर्ड लगाया है। कि हम बिकाऊ नहीं है। आप भी आशीर्वाद दीजिए कि ये लगा रहे। और उनके साथ साथ आप भी मुझ पर गर्व करते रहे।
Monday, May 3, 2010
विवेकानंद, लाओत्से, कबीर को पढ़ कर बिगड़ गए हम.....
तुम handsome हो नहीं। कपड़े अच्छे पहनते नहीं। बाल गिर गए हैं। गंजे हो गए हो। मोटापा इतना है कि बेडोल दिखते हो। बाहर पेट निकला है। कहीं से स्मार्टनेस झलकती ही नहीं। बोलते हो तुतलाते हो। नौकरी....पत्रकार हो। आखिर तुम से कौन करेगा शादी। दिल्ली में सालों पहले अपनी एक महिला मित्र ने पूछा था। और मैने कहा था कि जो इसके पार देखेगा। वह झल्लाकर बोली। तुम विवेकानंद, लाओत्से, कबीर और ना जाने ये कौन कौन सी किताबें पढ़ते रहते हो। इनको पढ़कर तुम बिगड़ गए हो।
अपने घर में सब के सब मास्टर ही हैं। सो घर में हर विषय पर कोई ना कोई किताब बचपन से ही देखी। विवेकानंद पर दादा का ज्यादा जोर था। कबीर पर पिता का। सो अपन ने बचपन से ही इन किताबों को पढ़ना शुरू किया। जब लोग बचपन में चंपक, नंदन और चाचा चौधरी पढ़ते थे। हम उन दिनों में आवारा मसीहा और निराला की साहित्य साधना, लाओत्से के सूत्र, कबीर की उलट बासियां पढ़ने लगे थे। समझ में कितना आया पता नहीं। लेकिन उन दिनों ही किसी से सुना था कि विवेकानंद कहते है। भारत में किसी का भी व्यक्तित्व उसका चरित्र बनाता है। जबिक अमेरिका में दर्जी बनाता है। ये बात ना जाने किस मुहूर्त में सुनी की आज भी कहीं छपी हुई मालूम पड़ती हैं। अपना सारा जोर रोचक बाते करने में ही लगने लगा। दार्शनिकों की मिशालें देना। उनकी कही हुई बातों पर गप करना हमारा शौक बन गया। हमें मजा न कभी जिम जाकर बॉडी बनाने में आया और न कभी तीन बार ढाड़ी बनाकर युनिवर्सिटी जाने में आया। दुनिया में जो विषय हमें कम रुचिकर लगे। उनमें एक फैशन भी था। इस विषय में हम आज भी निरक्षर ही हैं।
दिल्ली जब आए तब इसका खामियाजा भुगतना शुरू किया। यहां लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वे तुम्हारा चरित्र समझने की कोशिश करे। और फिर तुम्हें लेकर कोई धारणा बनाए। न तुम्हारे परिवार की यहां विरासत चलती है। और न कोई पहचान। तुम पहली नजर में जैसे दिखते हो वैसे ही तुम मान लिए जाते हो। सो अपन हर सांचे में फेल ही हुए। पर अपनी लापरवाही नौकरी के साथ कुछ जम गई। पत्रकार को लोग वैसे भी अभावग्रस्त ही मानते हैं। लिहाजा अपना लुक काम कर गया। किसी ने लापरवाह कहा तो किसी ने सनकी। कुछ ने होशियार भी माना। हालांकि इसके मानने वाले कम ही मिले।
अपने एक पुराने मित्र हैं। मेरी इस आदत से वे हमेशा ही खफा रहते है। और मुझे लगभग गरियाते रहते हैं। उनका कहना है कि अच्छा दिखना भी मेहनत क काम है। तुम इतने लापरवाह हो की तुम अच्छे दिख ही नहीं सकते। अपने आलस्य को दार्शनिकों की बातों से मत ढका करो। फिट रहने क लिए सुबह उठकर जिम जाना होता है। अच्छे कपड़े पहनने के लिए। अच्छा कमाना होता है। स्मार्टनेस एक दिन का खेल नहीं हैं। सालों का रियाज है। और अच्छे दिखने में बुराई क्या है। लेकिन मुझे शुरू से ही लगता रहा कि कोई भी यात्रा एक ही दिशा में हो सकती है। या तो हम बाहर की तरफ चले। या हम अंदर की तरफ चले। बाहर को जो खेल है। वह कुछ समय बाद खत्म हो जाता है। लेकिन अंदर की यात्रा दिन ब दिन आयुवान होती जाती है। मैं कभी भी न अच्छा दिख पाया न कोशिश की। हां ये बात अलग है कि लोगों से मेरी दोस्ती देर से होती रही है। पर दोस्ती के बाद संबंध लंबे और गहरे होते गए। क्यों कि मुझे लगता है कि जो व्यक्ति आपकी सुंदर कमीज और ब्रांडिड जींस से प्रभावित होता। उसका प्रभाव कपड़ो के साथ खत्म भी होता है। लेकिन जो आपके चरित्र से प्रभावित हो कर दोस्ती करता वह रिश्ता लंबा चलता है। खैर ये दिल्ली है। यहां पर लिबास की कीमत ज्यादा है। आदमी की कम। लेकिन अपन ने कब चाहा कि अपनी कीमत भी यहां लगे। जिस शहर में अपनी कीमत है। एक दिन वहीं वापस लौट जाएगें।
अपने घर में सब के सब मास्टर ही हैं। सो घर में हर विषय पर कोई ना कोई किताब बचपन से ही देखी। विवेकानंद पर दादा का ज्यादा जोर था। कबीर पर पिता का। सो अपन ने बचपन से ही इन किताबों को पढ़ना शुरू किया। जब लोग बचपन में चंपक, नंदन और चाचा चौधरी पढ़ते थे। हम उन दिनों में आवारा मसीहा और निराला की साहित्य साधना, लाओत्से के सूत्र, कबीर की उलट बासियां पढ़ने लगे थे। समझ में कितना आया पता नहीं। लेकिन उन दिनों ही किसी से सुना था कि विवेकानंद कहते है। भारत में किसी का भी व्यक्तित्व उसका चरित्र बनाता है। जबिक अमेरिका में दर्जी बनाता है। ये बात ना जाने किस मुहूर्त में सुनी की आज भी कहीं छपी हुई मालूम पड़ती हैं। अपना सारा जोर रोचक बाते करने में ही लगने लगा। दार्शनिकों की मिशालें देना। उनकी कही हुई बातों पर गप करना हमारा शौक बन गया। हमें मजा न कभी जिम जाकर बॉडी बनाने में आया और न कभी तीन बार ढाड़ी बनाकर युनिवर्सिटी जाने में आया। दुनिया में जो विषय हमें कम रुचिकर लगे। उनमें एक फैशन भी था। इस विषय में हम आज भी निरक्षर ही हैं।
दिल्ली जब आए तब इसका खामियाजा भुगतना शुरू किया। यहां लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वे तुम्हारा चरित्र समझने की कोशिश करे। और फिर तुम्हें लेकर कोई धारणा बनाए। न तुम्हारे परिवार की यहां विरासत चलती है। और न कोई पहचान। तुम पहली नजर में जैसे दिखते हो वैसे ही तुम मान लिए जाते हो। सो अपन हर सांचे में फेल ही हुए। पर अपनी लापरवाही नौकरी के साथ कुछ जम गई। पत्रकार को लोग वैसे भी अभावग्रस्त ही मानते हैं। लिहाजा अपना लुक काम कर गया। किसी ने लापरवाह कहा तो किसी ने सनकी। कुछ ने होशियार भी माना। हालांकि इसके मानने वाले कम ही मिले।
अपने एक पुराने मित्र हैं। मेरी इस आदत से वे हमेशा ही खफा रहते है। और मुझे लगभग गरियाते रहते हैं। उनका कहना है कि अच्छा दिखना भी मेहनत क काम है। तुम इतने लापरवाह हो की तुम अच्छे दिख ही नहीं सकते। अपने आलस्य को दार्शनिकों की बातों से मत ढका करो। फिट रहने क लिए सुबह उठकर जिम जाना होता है। अच्छे कपड़े पहनने के लिए। अच्छा कमाना होता है। स्मार्टनेस एक दिन का खेल नहीं हैं। सालों का रियाज है। और अच्छे दिखने में बुराई क्या है। लेकिन मुझे शुरू से ही लगता रहा कि कोई भी यात्रा एक ही दिशा में हो सकती है। या तो हम बाहर की तरफ चले। या हम अंदर की तरफ चले। बाहर को जो खेल है। वह कुछ समय बाद खत्म हो जाता है। लेकिन अंदर की यात्रा दिन ब दिन आयुवान होती जाती है। मैं कभी भी न अच्छा दिख पाया न कोशिश की। हां ये बात अलग है कि लोगों से मेरी दोस्ती देर से होती रही है। पर दोस्ती के बाद संबंध लंबे और गहरे होते गए। क्यों कि मुझे लगता है कि जो व्यक्ति आपकी सुंदर कमीज और ब्रांडिड जींस से प्रभावित होता। उसका प्रभाव कपड़ो के साथ खत्म भी होता है। लेकिन जो आपके चरित्र से प्रभावित हो कर दोस्ती करता वह रिश्ता लंबा चलता है। खैर ये दिल्ली है। यहां पर लिबास की कीमत ज्यादा है। आदमी की कम। लेकिन अपन ने कब चाहा कि अपनी कीमत भी यहां लगे। जिस शहर में अपनी कीमत है। एक दिन वहीं वापस लौट जाएगें।
Sunday, May 2, 2010
मौत का खौफ नहीं है। वेवजह मरने से चिढ़ होती है।
सुमन बुआ का फोन आया। कहां हो। दिल्ली में आतंकवादी घुस गए है। तुम घर कब पहुंचोगे। वे कभी भी दिल्ली में ब्लास्ट कर सकते हैं। तुम अभी कहां हो। टीवी वाले दिखा रहे हैं। तुम्हें कितनी देर लगेगी घर पहुंचने में। और फिर घर से फोन का सिलसिला शुरू हो गया। सभी के सवाल एक जैसे थे। और मेरे जवाब भी। क्या करें। हमारी नौकरी ऐसी है। जब दंगा फसाद हो। कोई बवाल मचें। तो लोग घरों को भागते हैं। हम दफ्तर जल्दी जल्दी पहुंचते हैं। आम आदमी खतरे वाली जगहों से निकलकर भागता है। सुरक्षित ठिकाने की तरफ। और हम सुरक्षित दफ्तरों और घरों से बाहर निकलते हैं कैमरा के साथ। खतरों वाली जगहों पर खबरों के लिए।
डर तो सभी को लगता है। मरने से। मुझे भी लगता ही होगा। लेकिन यकीन मानिए। मौत का खौफ नहीं है। एक अलग तरह की चिढ़ है। वे वजह मरने से। जिस तरह से हर आदमी की जिंदगी की एक वजह होती है। उसी तरह से मरने की भी एक वजह होनी चाहिए। मैंने सुना है कि भगतसिंह का वजन फांसी की सजा के बाद कुछ बढ़ गया था। यानि उन्हें मरने से डर नहीं लग रहा था। उनके पास वजह है। मरने की भी। लिहाजा मरने के लिए एक वजह तो हो। बाजार में कुछ खऱीदते समय। अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय। पत्नी को दफ्तर ले जाते हुए। दादी को अस्पताल ले जाते समय। या फिर खुद दो जून की रोटी के इंतजाम में लगे हुए। यूं ही मरना अजीब सा लगता है। कि कोई पगलाया हुआ आदमी आए। और यूं ही गोली मारकर चला जाए। तुम्हें मारकर उसे जन्नत मिल जाए।
हालांकि ये कहना गलत होगा कि इस तरह की चेतावनी का कुछ भी असर नहीं होता। लेकिन दिल्ली वालों ने इस डर से निजात पा ली है। मैंने लगभग हर बाजार में जाकर देखा। लोग बेखोफ खरीददारी करते नजर आए। लोग सरोजिनी नगर बाजार में तो बाकायदा पाउडर और बिंदी जैसी चीजें भी खरीदने आए। जिसे शायद टाला जा सकता था। लेकिन आम दिल्ली वालों ने इस चुनौती को अंदेखा किया। लेकिन क्या हमारी सरकारें इतनी निकम्मी होती जा रही है। कि अमेरिका अपने नागरिकों को पहले चेतावनी देती है। फिर हमारी सरकार हरकत में आती हैं। क्या हमारे नागरिकों की जिंदगियां दूसरे देशों के नागरिकों की जिंदगियों से कम कीमती है। या फिर हमारी सरकारों को अपने कामकाज और अपनी तिकड़म से फुर्सत ही नहीं है। कि वो आम आदमी की जिंदगी पर भी ध्यान दे सके। हमारे नेता सुरक्षित हैं। अपनी सुरक्षा को वाई से जैड और जेड से जेड प्लस कराने में व्यस्त हैं। मुझे लगता है कि जिस दिन हम अपने नागरिकों कि जिंदगियों की कीमत करना शुरू कर देंगे। उस दिन आतंकवाद अपने आप खत्म हो जाएगा। जिस दिन हमें इस बात का अहसास होगा कि आतंकवाद का शिकार भले एक आदमी होता हो। लेकिन मरता पूरा परिवार है। हर रोज। दुआ करिए कि मुझे मौत भी आए तो किसी ब्लास्ट में नहीं। हां आप तक किसी खबर का सच पहुचाते हुए। वहीं मेरा मोक्ष होगा।
डर तो सभी को लगता है। मरने से। मुझे भी लगता ही होगा। लेकिन यकीन मानिए। मौत का खौफ नहीं है। एक अलग तरह की चिढ़ है। वे वजह मरने से। जिस तरह से हर आदमी की जिंदगी की एक वजह होती है। उसी तरह से मरने की भी एक वजह होनी चाहिए। मैंने सुना है कि भगतसिंह का वजन फांसी की सजा के बाद कुछ बढ़ गया था। यानि उन्हें मरने से डर नहीं लग रहा था। उनके पास वजह है। मरने की भी। लिहाजा मरने के लिए एक वजह तो हो। बाजार में कुछ खऱीदते समय। अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय। पत्नी को दफ्तर ले जाते हुए। दादी को अस्पताल ले जाते समय। या फिर खुद दो जून की रोटी के इंतजाम में लगे हुए। यूं ही मरना अजीब सा लगता है। कि कोई पगलाया हुआ आदमी आए। और यूं ही गोली मारकर चला जाए। तुम्हें मारकर उसे जन्नत मिल जाए।
हालांकि ये कहना गलत होगा कि इस तरह की चेतावनी का कुछ भी असर नहीं होता। लेकिन दिल्ली वालों ने इस डर से निजात पा ली है। मैंने लगभग हर बाजार में जाकर देखा। लोग बेखोफ खरीददारी करते नजर आए। लोग सरोजिनी नगर बाजार में तो बाकायदा पाउडर और बिंदी जैसी चीजें भी खरीदने आए। जिसे शायद टाला जा सकता था। लेकिन आम दिल्ली वालों ने इस चुनौती को अंदेखा किया। लेकिन क्या हमारी सरकारें इतनी निकम्मी होती जा रही है। कि अमेरिका अपने नागरिकों को पहले चेतावनी देती है। फिर हमारी सरकार हरकत में आती हैं। क्या हमारे नागरिकों की जिंदगियां दूसरे देशों के नागरिकों की जिंदगियों से कम कीमती है। या फिर हमारी सरकारों को अपने कामकाज और अपनी तिकड़म से फुर्सत ही नहीं है। कि वो आम आदमी की जिंदगी पर भी ध्यान दे सके। हमारे नेता सुरक्षित हैं। अपनी सुरक्षा को वाई से जैड और जेड से जेड प्लस कराने में व्यस्त हैं। मुझे लगता है कि जिस दिन हम अपने नागरिकों कि जिंदगियों की कीमत करना शुरू कर देंगे। उस दिन आतंकवाद अपने आप खत्म हो जाएगा। जिस दिन हमें इस बात का अहसास होगा कि आतंकवाद का शिकार भले एक आदमी होता हो। लेकिन मरता पूरा परिवार है। हर रोज। दुआ करिए कि मुझे मौत भी आए तो किसी ब्लास्ट में नहीं। हां आप तक किसी खबर का सच पहुचाते हुए। वहीं मेरा मोक्ष होगा।
Saturday, May 1, 2010
मेहनत बैचने वाले भूखे और दुखी हैं। इमान बैचने वाले मजा कर रहे हैं.
हमारी जिंदगी भी अब तारीखों और दिनों में बंट गई है। अब हमें मदर्स डे पर मां की याद आती है। मई दिवस पर मजदूरों की। आज सुबह जब मैं निकला रिपोर्टिंग के लिए। तो मैं मेहनतकशों का चौराहा देख रहा था। एक ऐसी जगह जहां पर मजदूर सुबह से ही जमा हो जाते हैं। और अपनी मेहनत को आठ घंटे के लिए बैचने आ जाते हैं। मजदूरी हर रोज मिले ही ये जरूरी नही है। घर में चूल्हा जलना इनके लिए गांरटी नहीं हैं। मैं इन मजदूरों के चेहरों को देखता रहा। इनके चेहरे हर मिनिट बुझते जाते है। और दिन चढ़ने के कुछ देर बाद ही इनके चेहरे मर जाते हैं। दिन के शुरू में इन्हें उम्मीद होती है। मजदूरी मिलने की। और सपने होते है। दो जून की रोटी के। लेकिन जैसे जैसे समय निकलता जाता है। कुछ मजदूरों को लोग अपने साथ ले जाते है। लेकिन कुछ उन्हीं चौराहों पर अपनी बारी का इंतजार करते रहते है। कई बार उनकी बारी नहीं आती। शाम ढल जाती है।
हमारी दुनिया में इतना अंतर तो नहीं था। कि जो लोग अपनी मेहनत बैचना चाहते है। वे भूखे और उदास रहे। जो अपना इमान बैचते हैं। वे मजे करते हैं। माधुरी गुप्ता हमारी सरकार में अफसर बन जाती है। देश के साथ धोखा करती है। और चांदी कांटती है। क्यों हमारे कई नेता दिन दोगुने और रात चार गुने तरक्की करते हैं। जिन से हमें उम्मीद थी कि देश के विकास की। वे अपने विकास करने में जुटे हैं। कई बार बहुत दूर तक अंधेरा दिखता है। इसी उम्मीद में शायद किसी रोज कोई महात्मा गांधी...कोई भगतसिंह.....कोई खुदीराम बोस...कोई चंद्रशेखर आजाद अपने हाथ में दिया लेकर आएगा...और हमारी इस अंधेरी गुफा में रोशनी करेगा...हमें इंतजार रहेगा। जिस दिन मेहनत के इस बाजार में कोई भी मजदूर भूखा नहीं लौटेगा। हर घर में चुल्हा जलने की गारंटी होगी।
हमारी दुनिया में इतना अंतर तो नहीं था। कि जो लोग अपनी मेहनत बैचना चाहते है। वे भूखे और उदास रहे। जो अपना इमान बैचते हैं। वे मजे करते हैं। माधुरी गुप्ता हमारी सरकार में अफसर बन जाती है। देश के साथ धोखा करती है। और चांदी कांटती है। क्यों हमारे कई नेता दिन दोगुने और रात चार गुने तरक्की करते हैं। जिन से हमें उम्मीद थी कि देश के विकास की। वे अपने विकास करने में जुटे हैं। कई बार बहुत दूर तक अंधेरा दिखता है। इसी उम्मीद में शायद किसी रोज कोई महात्मा गांधी...कोई भगतसिंह.....कोई खुदीराम बोस...कोई चंद्रशेखर आजाद अपने हाथ में दिया लेकर आएगा...और हमारी इस अंधेरी गुफा में रोशनी करेगा...हमें इंतजार रहेगा। जिस दिन मेहनत के इस बाजार में कोई भी मजदूर भूखा नहीं लौटेगा। हर घर में चुल्हा जलने की गारंटी होगी।
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