Sunday, November 6, 2011

जिंदगी पलट कर देख रहा हूं। देखिए क्या होता हैं।

आपको यकीन शायद नहीं होगा। लेकिन मैं इन दिनों चार बजे उठ रहा हूं। यानि जितने बजे सोता था। उतने बजे उठ रहा हूं। अचानक ख्याल आया। जिंदगी चालीस के आसपास घूम रही हैं। अपन इस जन्म में कुछ कर नहीं पाए। लगा शायद कुछ तरीका ही गलत था। चल ही गलत रास्ते रहे थे। या फिर जिंदगी जी ही उल्टे तरीके से रहे थे। और कुछ तो अपने बस में था नहीं। सोचा चलो दिन की शुरूआत का तरीका बदल कर देखते हैं।
हर समय का अपना एक अलग समाज होता है। और हर समय का अपना एक अलग महत्व होता है। अपना घर सागर में तीनबत्ती पर है। यानि दिल्ली में कनाट प्लेस ।घर बाजार में है। बाजार की रौनक और भीड़ से घर कभी अछूता नहीं रहा। इसके साथ ही दादा फिर पिता चाचा हम और अब सुनते हैं छोटे दोनों भाई भी समाजिक हैं। यानि किसी न किसी तरह समाज के हर तबके से अपना रिश्ता रहा। दिल्ली में बैठकर कई चीजें आपको अतिश्योक्ति लग सकती हैं। लेकिन आज भी घर में अड्डा बाजी सुबह तक चलती रहती है। आपको लगभग पूरी रात अपने घर पर लोग बतियाते चाय पीते मिलेंगे। घर में कैरियर बनाने का माहौल नहीं था। न हीं महत्वकाक्षां थी। पनप ही नहीं पाई। हां पढ़ाई लिखाई का माहौल खूब था। कबीर से मिल्टन तक और कृष्ण से बर्टैंड रसैल तक। टैगौर से अमृता प्रीतम तक। फरीद से दादू तक। सभी तरह की किताबें खूब पढ़ी। और घर में आते जाते लोगों से बातें भी खूब सुनी। पिता की अड्डेबाजी रात में शुरू होती थी। वही अपनी स्कूल बनी। और जिंदगी का मजा आने लगा।
अपन को भी जिंदगी रात दस बजे के बाद अच्छी लगने लगी। जगदीश शर्मा से नाटकों पर और भरत खरे से कबीर से लेकर आज की दुनिया तक गप्पे रात में ही मजा देती थी। शैलेंद्र सराफ हों या सतीश नायक रात को चैतन्य होते थे। फिर कविता लिखने का शौक ऐसा लगा कि रात होतें ही कविता का जन्म होता। वह पनपती और बिटिया की तरह जवान होती। आशीष चौबे आशूतोष तिवारी आशीष ज्योतिषी गप्पों पर गप्पे करते जाते हैं। और रात निकल जाती है। दिल्ली आए तो घर की याद आती थी।और नींद नहीं आती थी। सो किताबें पढ़ते पढते सुबह हो जाती। अब नया शौक लग गया। ब्लाग लिखने का। फेस बुक और इंटरनेट ने जिंदगी ही बदल दी। अब किताबों की जगह टीवी और नेट ने ले ली। देर से सोना। देर से उठना। देर रात तक गप्प करना। अब फोन पर। अपनी जिंदगी का हिस्सा बन गया।
अब जिंदगी अचानक पलट रहा हूं। समाज भी अपना बदल रहा है। कभी तीन तो कभी चार बजे सोता था। अब नया प्रयोग कर रहा हूं। उतने बजे उठ रहा हूं। दस बजे सोता हूं तो अजीब सा लगता है। सुबह उठकर कई लोगों के मिस कॉल देखता हूं। गाली गलौज वाले मैसेज भी देखता हूं। जिन्हें लगता हैं। मैंने फोन नहीं उठाया। वे अपना गुस्सा भेज देते हैं। लेकिन इतने साल बाद पता लग रहा है। कि भगवान ने सुबह कितनी सुंदर बनाई हैं। मौसम किस तरह से तराशा है। वे लोग जिनके चेहरों पर चमक होती है। जिंदगी जिनके खाते में सफलता लिखती हैं। वे अक्सर सुबह सुबह दिखते हैं। लालच में उठने लगा हूं। देखिए कब तक उठ पाता हूं। सुबह की सर्दी और लिहाफ का लालच। दोनों मजेदार है। आप कब सोते हैं और कब उठते हैं। बताना जरूर।

3 comments:

  1. Bhaiya Charn sparsh,

    3.18 ka jikhr to kiya hi nahi.
    arvind

    ReplyDelete
  2. Badda Charn sparsh,

    Badda 3.18 ko to yaad kiya hi nahi.

    Arvind

    ReplyDelete